मंत्रदृष्टा ‘अपाला – (वैदिक कथा)

वन्यप्रदेश में, वट वृक्ष की सघन पर्णछाया सूर्यदेव की किरणों को मृदु करके धरती पर स्वर्णमयी आभा बिखेर रही थी। वहीं एक पाँच वर्षीय ऋषि कन्या पद्मासन में बैठी थी। कोमल मुख कमल-सा निर्मल था। बड़ी-बड़ी आँखें थीं, किन्तु बंद थीं, मानो दो नन्हें तारे रात्रि में विश्राम कर रहे हों। काले लंबे केश लटों में लहराकर कंधे का सौम्य स्पर्श कर रहे थे। किसी नवोदित पुष्प की प्रभाती शोभा-सी पवित्र और तेजस्वी कन्या के अधर हल्के-हल्के से कंपित थे, जैसे वह मंत्रपाठ कर रही हो।

महर्षि अत्रि की दृष्टि अपनी पुत्री पर पड़ी। अपाला का निर्मल स्वरूप देखकर उनके हृदय में वात्सल्य का भाव उमड़ आया। वे सावधानी से, धीमे कदमों से कन्या के निकट आए और उन अस्पष्ट किन्तु मधुर स्वरों को सुनने का प्रयास किया, जो अपाला के अधरों से प्रस्फुरित हो रहे थे।

“अपाला” – स्नेहसिक्त स्वर में उन्होंने पुकारा।

अपाला ने धीरे से आँखें खोलीं। पिता को समक्ष देखकर, उसके मुख पर प्रसन्नता खिल उठी।

“पुत्री, इस एकांत में बैठी तुम क्या कर रही हो?”

“पिताजी, मैं आपके दिए पाठ को दोहरा रही हूँ” – अपाला ने सौम्य स्मित और तुतलाहट के साथ कहा।

“तो फिर पुत्री, मैं तुम्हारी परीक्षा लेकर देखूँ?”

“अवश्य पिताजी” – अपाला का तुतलाता स्वर कोकिल-कंठ-सा चहक उठा। नन्ही शिष्या गुरु के समक्ष सावधान होकर बैठ गई।

“कहो, इंद्रदेव की प्रसन्नता प्राप्त करने का सबसे सुगम मार्ग कौन-सा है?” – महर्षि ने जानकर ऐसा प्रश्न पूछा, जिसका उत्तर अपाला को न ज्ञात हो।

अपाला ने दो क्षण विचार करने का अभिनय किया, फिर आत्मविश्वास से परिपूर्ण स्वरों में बोली – “पिताजी, सोमयाग के अनुष्ठान से व सोमलता का रस जो अमृत तुल्य है, उसके अर्पण से वे प्रसन्न हो उठते हैं।”

महर्षि स्तब्ध हुए – “किन्तु यह तो मैंने तुम्हें कभी न बताया, तुमने कैसे जाना?”

“स्वयं से जाना, पिताजी, आप जो भी बात सबके सामने कहते हैं, मैं सब कुछ ध्यान से सुनती हूँ, मैंने ठीक बोला न?” – अपाला के मुख पर उसके ही जैसा नन्हा-सा प्यारा-सा किन्तु तेजस्वी हास्य खिल उठा।

महर्षि ने स्नेह से अपाला के शीश पर हाथ फेरा, बोले – “पुत्री, तुम सदा की भाँति न केवल उत्तीर्ण हुई, वरन् मुझे आश्चर्य और गौरव से भर दिया। जाओ खेलो”

अपाला ने सिर झुकाया – “नहीं पिताजी, मैं खेलना नहीं चाहती, मैं अब माँ के पास जाकर उनके कार्यों में सहायता करूँगी, माँ बहुत काम करती हैं।”

महर्षि का हृदय आनंद से प्रफुल्लित हो उठा।
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वन की निस्तब्धता में झींगुरों की मधुर ध्वनि गूँज रही थी। रात्रि का शांत आलिंगन प्रकृति को अपने काले कुसुम-जटित आकाश के नीचे समेट रहा था। तारों का मणिमय समूह आकाश में झिलमिलाने लगा था। महर्षि अत्रि अपनी सहधर्मिणी देवी अनसूया के साथ शयन की तैयारी कर रहे थे।

“देवी, हमारी कन्या अपाला, कितनी असाधारण मेधा और योग्यता से सुशोभित है। उसका सेवा भाव और तीव्रबुद्धि – क्या ऐसी विलक्षण कन्या इस सृष्टि में कहीं अन्यत्र दृष्टिगोचर होती है? मानो विधाता ने साक्षात् सरस्वती और लक्ष्मी के गुणों का संयोग करके अपाला का सृजन किया हो।”

“ऋषिवर, आपका कथन सर्वथा सत्य है, अपाला अपने गुणों और निर्मल स्वभाव से, निस्संदेह सृष्टि का अनुपम रत्न है। मैं सोचती हूँ, सौंदर्य और गुणों के अलंकारों से शोभित, दिव्य पुष्प-सी खिलती हमारी कन्या का जो वरण करेगा, वह वर कितना भाग्यशाली होगा।”

कन्या के विवाह की बात सुनकर महर्षि के मुखमंडल पर चिंता की रेखाएँ उभरीं। गंभीर होकर बोले – “देवी, विधाता ने सृष्टि की रचना की, किन्तु वह क्यों किसी को पूर्णतः कलंकरहित नहीं बनाता? अपाला में सभी गुण विद्यमान हैं, किन्तु वह कुष्ठ रोग जो समय-समय पर उभरकर उसके शरीर पर श्वेत दाग छोड़ जाता है, क्या उसके विवाह में बाधा न बनेगा? यह दोष उसके सौंदर्य और समस्त योग्यता पर ग्रहण-सा लगा हुआ है।”

देवी अनसूया शांत और दृढ़ स्वर में बोलीं – “पूज्यवर, विधाता की सृष्टि में सर्वत्र पूर्णता ही व्याप्त है, मनुष्य की सीमित दृष्टि के कारण ही अपूर्णता दृष्टिगोचर होती है। अपाला का यह शारीरिक दोष उसके गुण और तेजस्विता को कम तो नहीं करता। ईश्वर ने कन्या को इतनी योग्यता प्रदान की है तो अवश्य ही इसके पीछे कोई दिव्य संकल्प होगा। आप चिंता न करें, भगवान उचित मार्ग समय पर अवश्य प्रशस्त कर देंगे।”

महर्षि को सान्त्वना प्राप्त हुई – “देवी, तुम्हारे वचन सदैव ही मेरे हृदय को शांति प्रदान करते हैं।”
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चित्रकूट के पवित्र सान्निध्य में, दण्डकारण्य के एकांत पुण्य क्षेत्र में, महर्षि अत्रि का आश्रम अवस्थित था। इसके चारों ओर अशोक, आम्र, वट और पीपल के वृक्ष अपनी शाखाओं को फैलाए, वायु के सौम्य स्पर्श से नृत्य करते थे। पत्तियों की सरसराहट और मंदाकिनी की कलकल ध्वनि मिलकर एक स्वर्गीय राग उत्पन्न करते थे।

युवा आचार्य कृशाश्व – कृशकाय किन्तु तेजस्वी, आश्रम में प्रवेश करते हैं। उनके स्वागत हेतु कोई उपस्थित न होने से वे एक शिला पर सौम्यतापूर्वक बैठकर प्रतीक्षा करने लगे। उनकी प्रतीक्षा को भंग करते हुए एक कोमल स्वर गूँज उठा, “प्रणाम आचार्य, यह जल ग्रहण कीजिए।”

कृशाश्व ने दृष्टि उठाई। उनके समक्ष एक युवा कन्या खड़ी थी। वह रूप था या साक्षात् प्रकृति का लावण्य। कृशाश्व युवती का रूप देखकर स्तब्ध रह गए। युवती की देह नवपल्लवित लतिका-सी सुगठित थी। मानो चन्द्रमा की शुभ्रता, मलय पवन की कोमलता, स्वर्णलता की सुडौलता, मधुमास की मादकता, कमलदल की निर्मलता, और ऋचाओं की पुण्यता का साकार समन्वय हो। वह मानो स्वयं विधाता का लिखा जीवित श्रृंगार-काव्य थी। उन्होंने जल ग्रहण किया।

अपाला ने मधुर वाणी में कहा, “आचार्य, कृपया कुटीर में विराजमान हों। मैं आपके लिए यज्ञोचित आतिथ्य की व्यवस्था करती हूँ।”

अपाला ने मधुपर्क प्रस्तुत किया। कृशाश्व की दृष्टि अपाला के प्रत्येक अंग पर स्थिर होकर फिसल रही थी। अपाला ने उनकी उत्सुक दृष्टि को पहचान लिया। उसके कोमल मुख पर लज्जा की लालिमा छा गई, और वह अपने वस्त्रों को संभालती हुई कुटीर की ओर चली गई।

कृशाश्व की दृष्टि बेचैन हो उठी, अपाला को खोजने लगी। तभी उन्हें महर्षि अत्रि आते दिखे। आचार्य ने तत्काल उठकर चरण वंदना की। महर्षि ने स्नेहपूर्ण आशीर्वचन दिए और बोले, “आचार्य, आइए, मैं आपके लिए मधुपर्क मँगवाता हूँ। यज्ञ के उपरान्त भोजन कर विश्राम करें। सायंकाल हम भेंट करेंगे।”

कृशाश्व ने विनम्रता से उत्तर दिया, “ऋषिवर, आपके आगमन से पूर्व ही मेरी सेवा कर दी गई है।”

महर्षि ने कौतूहल से पूछा, “भला किसने?”

“वह रूपवती कन्या, जो आपके आगमन से कुछ क्षण पूर्व सामने कुटीर में चली गई,” कृशाश्व ने कहा। “उसका रूप और व्यवहार पवित्र और तेजस्वी था।”

महर्षि के मुख पर स्मित खिल उठा। “वह मेरी पुत्री अपाला है,” उन्होंने कहा। “अत्यंत कुशाग्रबुद्धि, विदुषी और व्यवहारकुशल। उसका सेवाभाव और गुण यहाँ सर्वोत्तम हैं।”

कृशाश्व ने क्षणभर चिन्तन किया। फिर दृढ़ स्वर में बोले, “ऋषिवर, दीर्घकाल तक मैंने तप और ब्रह्मचर्य का पालन किया है। मेरा शरीर साधनाओं से कृशकाय हो चुका है। किन्तु अपाला को देखकर मेरा हृदय विवाह का संकल्प ले चुका है। मैं आपकी योग्य पुत्री के साथ वैवाहिक बंधन में बंधना चाहता हूँ।”

महर्षि के हृदय में आश्चर्य, प्रसन्नता और चिन्ता का मिश्रित भाव उमड़ा। वे बोले, “कृशाश्व, तुम्हारा यह निश्चय यज्ञ के समान शुभ है, किन्तु क्या तुमने अपाला को भली-भाँति देख लिया है?”

कृशाश्व ने दृढ़ता से कहा, “हाँ, ऋषिवर, मैंने उसे भली-भाँति देख लिया है। उसका रूप, गुण और व्यवहार मेरे हृदय में स्थिर हुए हैं, जैसे यज्ञाग्नि हवि से तृप्त होती है। निश्चित ही देवी अपाला का सान्निध्य पाकर मैं तृप्त होऊँगा। क्या आप मुझे अपनी कन्या के योग्य समझते हैं?”

अपाला विवाह योग्य हो गई थी, किन्तु रोग के कारण विवाह में बाधा उत्पन्न हो रही थी। कृशाश्व का निवेदन सुनकर और कृशाश्व को सर्वथा योग्य समझकर महर्षि बोले, “कृशाश्व, तुमसे अधिक योग्य और उत्तम वर मेरी कन्या के लिए भला और कौन हो सकता है? मैं शीघ्र ही तुम दोनों के विवाह का प्रबन्ध करता हूँ।”

इस प्रकार यज्ञ के आचार्य कृशाश्व और अपाला का विवाह विधिपूर्वक सम्पन्न हुआ। कुछ दिवस आश्रम में निवास कर, अपाला ने अपने पति के साथ नवीन गृह की ओर प्रस्थान किया।
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महर्षि अत्रि ब्रह्माजी के तृतीय पुत्र हैं, जो जगत में प्रजापति के रूप में विख्यात हैं। मैं ऐसे महान ऋषि की पुत्री अपाला हूँ। मेरी माता बाल्यकाल में मुझे बताती थीं कि, ब्रह्माजी ने जब सृष्टि का विस्तार करना चाहा तो उनके प्रारम्भिक पुत्र, ज्ञान और वैराग्य के कारण सृष्टि से उदासीन और निरपेक्ष हुए। तब ब्रह्माजी ने सृष्टि के विस्तार के लिए जिन्हें जन्म दिया, उनकी प्रजापति संज्ञा हुई। मेरे पिता और माता का जीवन अत्यंत तपोमय, शांत और निर्विकार था। मैंने बाल्यकाल से ही अपने माता-पिता के प्रत्येक गुण, व्यवहार और आचरण को आत्मसात किया।

सब कहते थे मैं अत्यंत रूपवती और गुणवती हूँ। मैं बहुत प्रसन्न होती। किन्तु मेरे रोग के कारण जब कभी माता-पिता चिन्तित होते तो मैं दुखी होकर स्वयं को कोसा करती। पिताजी ने अनेक औषधियों का निर्माण करके मुझे खिलाया, मेरे श्वेत चिह्नों पर नाना औषधियों के लेप मेरी माता किया करतीं। किन्तु वह चिह्न कम न हुए। सब आश्रमवासियों को मेरे रोग का ज्ञान था, किन्तु महर्षि की पुत्री होने के कारण कोई इस पर कुछ बोलने का साहस न करता था।

अपने पिता को मैं कर्तव्यों का पालन करते देखती, हँसते हुये देखती। किन्तु मुझे ज्ञात था कि वे सदैव इस चिन्ता में रहते, किन्तु कभी मुझसे कुछ न कहते थे। उन्होंने सदैव मुझे स्नेह दिया, इतना प्रेम दिया कि मैं स्वयं को संसार की सबसे भाग्यशाली पुत्री समझा करती।

इस प्रकार समय व्यतीत होता गया, मेरे विकसित यौवन ने शरीर के श्वेत चिह्नों को छिपा दिया। जो भी मुझे देखता था, उसकी दृष्टि मेरी देहयष्टि पर जाती, किन्तु श्वेत धब्बे किसी को न दिखाई देते।

आचार्य ने जब पिताजी के समक्ष विवाह का निवेदन किया था, तो मैं कुटीर के कोने से झाँक रही थी। उनकी बातें न सुनते हुए भी मैं सब समझ रही थी। मैं धन्य हुई।

यहाँ आकर मेरा हृदय सदैव आनंद की सरिता में डूबा रहता है। हर क्षण एक चंचलता, एक उत्साह हृदय में उठता है, कब पति मेरे समीप आएँगे।

मैं सदैव अपने पति की सेवा में लीन रहती हूँ। पति के लिए प्रेम से पौष्टिक भोज्य पदार्थों का निर्माण कर उन्हें खिलाना ही मेरा तप है, उनके अंगों पर मर्दन करना ही वात्सल्य का स्पर्श है। मेरा जीवन उनकी सेवा में ही समाहित है। समुद्र में विलीन किसी नदी की भाँति मैं अपना अस्तित्व खोकर उनमें ही मिल जाना चाहती हूँ। वे भी सदैव अपना स्नेह बिना कुछ कहे, संकेतों से मुझे दिखाते रहते हैं।

और वह दिन आया जब पहली बार उन्होंने दीपक के प्रकाश में मुझे पूर्णतः देखा। वे छिटककर मुझसे दूर हो गए। मैंने उनकी दृष्टि में अपने लिए घृणा देखी। मेरे मन में आया, इसी क्षण मेरी मृत्यु हो जाए, किन्तु न हुई।

उनकी अनुरक्ति विरक्ति में परिवर्तित हो गई। अब कभी उनके प्रेम की दृष्टि मेरी ओर नहीं पड़ती। मैं जानकर उनके सम्मुख हो जाऊँ तो उनकी कटु दृष्टि का विषाक्त तीर मेरे हृदय को विदीर्ण कर देता है। मैं व्यथित हो उठती हूँ।

मैं बस अपने सेवा कार्यों में लगी रहती हूँ, किन्तु मेरे मन में हर समय यही बात घूमा करती है। कभी उनसे कुछ कहने का साहस नहीं कर पाती। एक दिन हिचकते हुए जाने कैसे मेरे मुख से शब्द निकल गए – “पूज्यवर, क्या मेरी सेवा में कोई कमी है? या मुझसे कोई अपराध हो गया है? मैं केवल आपका स्नेह चाहती हूँ, आप मुझसे क्यों दूर रहते हैं? मैं क्या करूँ जिससे आप प्रसन्न हों?”

मेरे दीन अनुनय पर उनका उत्तर कटार-सा चुभा – “अपराध तुम्हारी कलंकित देह का है, अपाला। मैं जब भी तुम्हारी ओर देखने का प्रयास करता हूँ, तुम दिखाई नहीं देती, वह रोग दिखाई देता है।”

मैं तड़प उठी, जैसे जलती अग्नि में फेंक दिया गया हो। मेरा रोग अब बढ़ रहा था, किन्तु रोग की पीड़ा से अधिक कष्टदायक था यह हृदय का आघात, कोई गहन व्रण जो न भरता है, न सूखता है।

पति यदि भीषण रोग से ग्रस्त हो तो स्त्री को उसकी सेवा का विधान है। रोगग्रस्त पति की सेवारत स्त्री सती कहकर पूज्य होती है, ऐसा माता कहती थीं। किन्तु पत्नी रोगी हो तो क्या उसकी पीड़ा नहीं होती है? क्या रोग की पीड़ा के साथ, पति द्वारा बहिष्कृत यह असहनीय व्यथा ही मेरी नियति है? मैंने क्या अपराध किया जो मेरा जीवन यूँ व्यर्थ गया।

मेरा रोग बढ़ रहा था, मैं पीड़ा सहती किन्तु कुछ न कहती। अपनी उपेक्षा मेरे लिए असहनीय हो चली थी। मैंने उनसे पिताजी के घर जाने की आज्ञा माँगी। उन्होंने बिना एक क्षण भी विचार किए, सहर्ष आज्ञा दे दी और स्नान करने चले गए।

मैं सजल नेत्रों से उन्हें देखती रही, क्या वे मुड़कर मेरी ओर एक बार भी न देखेंगे? नहीं… वे नहीं मुड़े। मैं बिलखकर रोने लगी। वे कृशकाय थे, मैं कितनी निष्ठा से उनकी सेवा करती थी, अपना अस्तित्व, अपना सर्वस्व इनके ही तो चरणों में समर्पित किया था। क्या अब मेरा मुख देखना अभी अयोग्य हो गया था? क्या मेरा रोग मेरी सारी मूल्यवानता छीन लेता है? क्या अपाला का और कोई अस्तित्व नहीं है?

रोते हुए मैं पिताजी के आश्रम पर पहुँची। भीतर जाने से पहले मैंने आँसू पोंछ लिए। मार्ग में मैंने अभिनय करके देखा कि पिताजी के सामने किस प्रकार हँसना है, स्वयं को प्रसन्न दिखाना है।

मैंने पिताजी को हँसते हुए प्रणाम किया। उन्होंने मुझे उठाकर मेरी ओर देखा, मैं हँसने लगी। फिर भी जाने क्यों पिताजी मुझे देखकर विचलित हो उठे।जैसे कोई विशाल वृक्ष आँधी से हिल उठा हो। मैंने अपने समस्त भावावेगों को पूरी शक्ति लगाकर रोका और दृष्टि नीचे कर ली। मुझे पिताजी का स्वर सुनाई पड़ा।

“तुम वही अपाला हो, जो यहाँ हिरण-शावक-सी चहका करती थी? आज इतनी रुग्णावस्था में हो, दीन-हीन, जैसे किसी दिव्य नदी का सूखा अवशेष। मुख विवर्ण हो चुका है, मुखकान्ति बुझी हुई है, सब सुषमा लुप्त हो चुकी है, तुम कैसे हँस रही हो पुत्री?”

पिताजी ने देखा, मेरे घावों से दूषित रक्त बह रहा था। मैंने ऊपर दृष्टि की, पिताजी के नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली। मैं भी रोते हुए उनके चरणों में लोट गई।

पिताजी को कुछ बताने की आवश्यकता न हुई, वे समझ गए। उन्होंने काँपते स्वर में कहा – “तू चिन्ता न कर, अपनी पीड़ाओं को भूल जा, तेरी असाध्य व्याधि को देवता निश्चित ही दूर करेंगे।”

मेरे पिता आयुर्विज्ञान के प्रवक्ता थे, मेरे भाई चन्द्रमा को धरती की समस्त औषधियों का राजा कहा जाता था। मेरे घावों पर दिव्य औषधियों का लेपन किया गया। यह तपोवन औषधियों से परिपूर्ण था। माँ ने मेरी सेवा-सुश्रूषा की, जैसे कोई माता अपने शिशु को नवजीवन प्रदान कर रही हो। धीरे-धीरे घावों का रक्तस्राव बंद हुआ, पीड़ा समाप्त हो गई, घाव भर गए। किन्तु शेष रह गए वही श्वेत धब्बे, जैसे कोई चन्द्रमा पर कलंक, और मेरे मन का संताप।

वह घाव जो पति ने दिया था, कैसे भरता? वह घाव जो रक्तस्राव न करे किन्तु जलता रहे, इसकी कोई औषधि हो सकती थी? माँ और पिता इस रिक्तता को कैसे भरते? वे मुझे पुनः पति के पास भेजते, किन्तु आशंका थी कि रोग पुनः उभरे तो क्या होगा?

मेरे पिता ने भाई चन्द्रमा से विचार-विमर्श किया, अनेक ऋषि-मुनियों से परामर्श लिया। किन्तु कहीं से ऐसा आश्वासन न मिला जो मेरे जीवन से समस्त विषादों को समाप्त कर दे। मैं सबके सामने प्रसन्न रहती, जैसे मुझे कोई चिन्ता न थी, किन्तु एकांत में मेरे नेत्रों में सदा अश्रु होते। मेरे हृदय में दाह था, जैसे कोई अग्नि जो न बुझती हो। यह स्त्री नियति की करुणा, कभी न टूटने वाले पत्थर पर लिखी गई, न मिटने वाली लिपि से। मेरा अस्तित्व भटक रहा था, जैसे खोई आत्मा, अपने विश्राम की छाया खोजती हो, वह कहाँ मिलेगी?

पिताजी के परम पावन आश्रम में अन्य कोई अभाव न था। किन्तु मुझे प्रतीत होता था कि मेरी माता चिन्तित होतीं कि पुत्री जीवन भर यहाँ रहेगी तो बड़ी अपचर्चा होगी। मुझे कभी समझ नहीं आया कि पुत्र जब जीवन भर अपने माता-पिता के समीप रहकर उनकी सेवा कर सकता है तो पुत्री क्यों नहीं? धर्मशास्त्र और लोकाचार की यह रहस्यमयी गुत्थी क्या कभी मेरी समझ में आ सकेगी?

मेरे पिता दृढ़ संकल्प लेकर एक अनुष्ठान में रत हुए। वे न कुछ खाते थे, न पीते थे, न किसी से बात करते थे। तब उन्हें बोध हुआ कि मेरी असाध्य व्याधि के चिह्न देवराज इंद्र ही प्रसन्न होकर दूर कर सकते हैं।

मेरे पिता से देवराज प्रसन्न रहा करते थे, किन्तु उन्होंने निवेदन न किया। संभवतः उनका विश्वास था कि मैं अपनी साधना, सेवापरायणता से उन्हें सुप्रसन्न कर मनवांछित वर स्वयं प्राप्त करूँगी। या कि उनका निवेदन देवराज अस्वीकार कर सकते थे?

पिता के निश्चय को मैंने अपना संकल्प बना लिया। मैं देवराज को प्रसन्न करूँगी, उन्हें मुझे प्रत्यक्ष दर्शन देना ही होगा। मैं अखंड साधना में जुट गई।

प्रत्येक क्षण में देवराज का चिंतन करती, उनकी स्तुति करती। रात्रि को उनका ही विचार करते-करते मैं शयन करती। मुझे ध्यान आया कि मैंने बाल्यकाल में पिताजी से कहा था सोमलता का। सोमाभिषव क्रिया को सम्पन्न करने के लिए अब मुझे खोजनी थी दिव्य सोमलता। इंद्रदेव के निरंतर चिंतन से मुझे प्रतीत होता कि मेरे मुख की कान्ति बढ़ रही है, मैं ऊर्जावान हो रही हूँ।

मैं साधना में इतनी लीन हो गई कि दिन निराहार और निर्जला में व्यतीत होने लगे। मुझे पुनः याद आई सोमलता। इंद्रदेव इसे ग्रहण करने अवश्य आएँगे। आश्रम के समीप निर्मल सरोवर में जाकर मैंने स्नान किया। वृक्ष, जल, दिशाएँ – सब मुझे प्रसन्नता से भरे दिख रहे थे।

मैं बेचैन होकर सोमलता खोजने लगी। खोजते-खोजते मैं दूर निकल आई। मुझे एक स्थान पर वह दिख पड़ी, जैसे ज्योति की प्रभा हो। मैंने लता के समीप पहुँचकर हाथ जोड़े एवं उसका पूजन-वंदन किया – “हे सोमलता, मैं सामर्थ्यशाली देवराज इंद्र को प्रसन्न करने के लिए तुम्हारा वरण करती हूँ।”

मैंने देवराज का आवाहन किया – “हे परम तेजस्वी, सुवीर, आप मेरे सम्मुख आएँ।”

और सोमलता का रस निकालने के लिए अपने आसपास पत्थर खोजा, किन्तु वहाँ कोई पत्थर न था। मेरे प्राण सूख उठे।

मैं व्याकुल होकर चारों ओर भागती पत्थर खोजने लगी। प्रत्येक क्षण युगों-सा प्रतीत हो रहा था। कोई पत्थर वहाँ न दिखा, मैं रोने लगी। समय व्यतीत होता जा रहा था।

जब पत्थर न दिखा तो मैंने सोमलता को चबाना प्रारम्भ कर दिया। मेरे दाँत कट-कट कर बजने लगे। सोमलता का रस मुख में झरने लगा।

मेरे मुख से शब्द स्वतः ही उच्चरित होने लगे – “हे शक्र, वज्रधर, आप स्वर्ग के अधिपति हैं, सहस्राक्ष हैं, सर्वदृष्टा हैं। मेरे हृदय की पुकार सुनिए। हे शतक्रतु आप यज्ञों के स्वामी हैं, सोमरस से तृप्त होते हैं, आप मेघों को रथ बनाकर वर्षा करते हैं, आप ही जीवनदाता हैं। मेरे हृदय की रिक्तता को पूर्णता देने हेतु प्रकट होइए।”

तब मुझे स्वर सुनाई दिए – “हे देवी, यहाँ सोमाभिषव की ध्वनि सुनाई दे रही है, क्या पत्थर के द्वारा सोमलता का रस निकाला जा रहा है?”

मैंने देखा – एक महातेजस्वी युवक। मैं देवराज के ध्यान में मग्न थी, मेरे मुख से निकला – “महर्षि अत्रि की पुत्री अपाला ने अपने प्रिय देवराज को समर्पित करने के लिए सोमलता को चर्वण किया है, यह पत्थर के द्वारा सोमलता कूटने की ध्वनि नहीं, मेरे दाँतों से उत्पन्न ध्वनि है।”

अकस्मात मुझे होश आया, मैंने देखा – सूर्य-सी ज्योति से दैदीप्यमान, यह देवराज ही तो हैं, समस्त स्वर्ग का आलोक उनके तेज में समाहित था। देह स्वर्ण-सी चमकती, मुख से करुणा और शक्ति झलक रही थी। दक्षिण हस्त वज्र से सुशोभित था, जो विद्युत की चमक-सा प्रभासित था। मेरा हृदय आलोकित हो उठा।

वे वापस लौटने लगे।

मैं भावविह्वल हो उठी – “हे सोमप सुरपति, आप वापस क्यों लौट रहे हैं, आप तो सोमरस पान हेतु ही यज्ञमंडप में प्रकट होते हैं।”

वे बोले – “किन्तु यहाँ सोमरस कहाँ है?”

“मेरे दाँतों के द्वारा चबाई गई सोमलता के रस का पान करके, मेरा उद्धार करें।” – मैंने अतिशय अनुरागवश कहा।

वे मेरे समीप आए। सोमरस ग्रहण किया। – मैं इंद्रभाव से आविष्ट हो उठी। पतिबहिष्कृता अपाला ने आज सौभाग्यवश इंद्रदेव को प्राप्त किया।

प्रसन्न व तृप्त इंद्रदेव ने मुझसे वर माँगने को कहा। मैंने अपनी इच्छा व्यक्त की।

तब शतकर्मा देवराज ने अपने रथ, शकट और युग छिद्र से तीन बार मुझे खींचा। मैंने देखा – मेरे शरीर से सजारू, कृक्लास आदि के रूप में समस्त चर्मदोष निकल गया।

अत्यंत प्रसन्न, तृप्त होकर मैं आश्रम लौटी। सबने सूर्य की कान्ति के समान दमकती हुई मुझे देखा। इंद्रदेव की कृपा से मेरी देह ही नहीं, मेरा अंतर भी परिवर्तित हो गया था। एक ज्ञान की अग्नि मेरे भीतर प्रकट होने लगी, मुझे दिखाई देने लगीं प्रत्यक्ष ऋचाएँ… सब मुझे ब्रह्मवादिनी कहकर पुकारने लगे।

एक दिन वह पुनः लौटे। संभवतः उन्होंने मेरी कीर्ति सुन ली थी। मेरी कायाकल्प होने का समाचार उन्हें प्राप्त हो गया था।

“देवी, मैं कृशाश्व, तुम्हें वापस लेने आया हूँ।”

मैंने दृष्टि फेर ली, उनका मुख नहीं देखा, निर्विकार भाव से कहा – “यह देह अब आपकी नहीं है, यह देवेंद्र को समर्पित हो चुकी है। यह अब उनकी ही अर्चना के काम आएगी। आप अपने लिए कोई अन्य देह खोज लीजिए। जब वह देह क्षीण हो जाए तो पुनः आपको अन्य कोई नई देह मिल जाएगी। आप देह के ही आकांक्षी हैं, किन्तु मेरी यह देह अब देह नहीं है, यह दिव्य आत्मस्वरूप मंदिर बन चुकी है, यह आपके कार्य की नहीं।”

मैं बिना उनकी ओर देखे चली आई। किन्तु मैं फिर भी देख पा रही थी उन्हें, तिरस्कृत होकर, लज्जित होकर वापस लौटते हुए।

शचीन्द्र शर्मा

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