आर्यसमाजी की ‘जाति-गत जनगणना’

घर के आँगन में आरामकुर्सी पर बैठे, बाबूलाल आर्य ने तंबाकू मलते हुए उपदेश देना शुरू किया, “देखो बेटा कलुआ, ऋषि दयानंद ने इस जात-पात की बेड़ी को न तोड़ा होता, तो हम आज भी सवर्णों के बाड़े में गोबर उठा रहे होते, उनके चाकर बने होते। महर्षि ने हमें सिर उठाना सिखाया, आँख से आँख मिलाना सिखाया। आज देखो मैं  ब्राह्मण हूँ। अगर स्वामी जी न होते, तो क्या ऐसा होना संभव था? जाति तो कर्म से ही बनती है।”

कलुआ आर्य के गाल थोड़े फूले थे, मुँह में गुटखे की पीक भरी थी। उसने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, थूकने की कोई जगह न थी। उसने स्वयं को बोलने में असमर्थ पाया, सहमति में बस गर्दन हिला दी।

बाबूलाल इससे संतुष्ट न दिखे। तब कलुआ सियार की भाँति मुँह ऊपर उठाकर थोड़ा बड़बड़ाया, “ठीक कहे चाचा जी।”

आँगन में एक ओर, बाबूलाल की पत्नी सुशीला देवी चूल्हे पर रोटी सेंक रही थी। उनकी कन्या पिंकी पास बने घुसलखाने से नहाकर निकली, कलुआ को सामने देखकर चौंक गई। दोनों की नज़रें मिलीं। कलुआ ने देखा, बाबूलाल तंबाकू होंठों के नीचे दबा रहे हैं। उसने झट से आँख मारी, पिंकी लजा गई।

कलुआ का समय ठहर-सा गया। पिंकी की चन्द्रकान्ति का आलोक, रात्रि-रूपी काले कलुआ को प्रदीप्त कर गया। पिंकी के खुले बिखरे केश काले मेघों-से लहराते, किंचित नम, सावन की प्रथम बूँदों से सिक्त कुसुम-लताओं-से इठलाते। वह कलुआ के समीप से गुज़री, उसके तन की सुगंध से कलुआ का तन तड़प उठा। वह मोहक सुगंध जैसे चम्पा और चंदन का मिश्रित गंध-राग।

पिंकी को देखकर सुशीला ने पुकारा, “ले बेटा, कालू भैया को रोटी दे आ।”

पिंकी थोड़ा झेंप गई, लेकिन कलुआ के चेहरे पर कोई अन्य भाव न जन्मा। जब से उसने स्वामी दयानंद का यह भाव पढ़ा था कि, “अगर भाई-बहन एक-दूसरे के गुण-अवगुण न जानते हों, तो विवाह हो सकता है,” कलुआ को नैतिक सम्बल मिला था। फिर पिंकी तो सगी बहन भी न थी।

पिंकी ने थाली कलुआ को पकड़ाई। कलुआ ने थाली लेते में पिंकी के हाथों को अपने हाथों से दबाया। पिंकी का हृदय स्पर्श से मचल उठा, जैसे सरिता की लहरें किनारे से टकराकर थिरक उठी हों। उसकी देह जो अभी-अभी अवगाहन से सिक्त थी, कलुआ के छेड़खानी-भरे स्पर्श की चिंगारी से आल्हादित हो उठी।

वह मुस्कुराती हुई, केश संवारती हुई, चूल्हे के पास जा बैठी, पर उसकी सिहरन, वसंत की लहर-सी आँगन में बिखर गई थी। कलुआ को अपने शरीर के भूगोल में हुए परिवर्तन का आभास हुआ। थोड़ी देर पहले खाये गुटखे का ध्यान आया, उसने थाली वापस रख दी।

बाबूलाल ने पुनः कहना शुरू किया, “जन्म से जाति मानने का भला क्या तुक है? इन दुष्टों ने शास्त्रों को अपने हिसाब से चलाया। ऋषि दयानंद का बड़ा उपकार है, जिन्होंने सही अर्थ को जनाया और बताया कि मनुष्यों के कर्मों से ही उसकी जाति तय होती है।”

कलुआ ने गर्दन हिला दी और पीछे मुड़कर देखा। दरवाजे पर खटखट हुई थी। एक नौजवान कुछ सफ़ेद कागज़ और पेन हाथ में लिए खड़ा था। कलुआ ने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।

नौजवान ने परिचय दिया, “जी, मैं जनगणना अधिकारी हूँ।”

बाबूलाल ने उत्साह से स्वागत किया, “आइये, बैठिए, बैठिए।” उन्होंने उस इकलौती पड़ी कुर्सी की ओर इशारा किया, जिस पर कलुआ बैठा था। हालाँकि कलुआ ने अपमानित महसूस किया, लेकिन विवश होकर उसे उठना पड़ा। पिछले माह से जबसे आर्यसमाज ने उसका जनेऊ संस्कार किया है, उसमें विशेष अभिमान जागृत हो उठा है। पहले वह बड़े से बड़े अपमान का घूट सहज ही पी जाता था, किन्तु अब ब्राह्मण हो जाने से उसकी थोड़ी भी अवहेलना, उसको अपमानित कर देती है।

प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। नाम, आयु, लिंग, शिक्षा आदि नौजवान पूछता गया, बाबूलाल बताते गए।

नौजवान ने पूछा, “बाबूलाल जी, आपकी जाति?”

“मेरी जाति…” बाबूलाल सपकपाए, माथे पर कुछ क्षण के लिए सिलवटें आईं। उनकी नज़र सामने रखी सत्यार्थ प्रकाश पर पड़ी। उनका सीना गर्व से फूल उठा, आँखों में चमक आ गई। मुँह उठाकर गरजे, “मैं वेद पढ़ता हूँ, यज्य करता हूँ, लोगों में प्रचार करता हूँ, सो मैं ब्राह्मण हूँ।”

नौजवान ने लिखा और विदा लेने को तैयार हुआ, “ठीक है, तो मैं चलता हूँ।”

बाबूलाल ने टोका, “चलता हूँ? क्या केवल मेरी ही जाति पूछी जाएगी, मेरी पत्नी और बेटी की नहीं?”

नौजवान ने हैरानी से पूछा, “आपकी पत्नी क्या आपकी जाति की नहीं है?”

बाबूलाल ने दृढ़ता से जवाब दिया, “नहीं।”

नौजवान ने उत्सुकतावश पूछा, “तब फिर उनकी क्या जाति है?”

बाबूलाल ने गर्व से घोषणा की, “वो वैश्य है।” सुशीला देवी ने तुनककर देखा लेकिन मौन रह गई।

नौजवान मुस्कुराया, “अच्छा, तो अंतर्जातीय विवाह है आपका?”

बाबूलाल ने स्पष्ट किया, “नहीं तो।”

नौजवान चौंका, “लेकिन आपकी और पत्नी की जाति तो आप अलग-अलग बता रहे हैं?”

बाबूलाल ने गंभीरता से समझाया, “देखो भाई, हम आर्यसमाजी हैं, कर्म के हिसाब से जाति मानते हैं।”

नौजवान ने जिज्ञासा से पूछा, “अच्छा, तो आपके हिसाब से आपकी बेटी की जाति क्या है?”

बाबूलाल सोच में पड़ गए, “पढ़ाई छोड़कर बैठी है, कितनी बार इससे कहा है कि अध्ययन-अध्यापन में रुचि ले, पर इस कमबख्त के कान पर जूँ नहीं रेंगती।” फिर पिंकी की ओर देखकर बोले, “पिंकी, बताओ तुम घर में क्या काम करती हो?”

पिंकी ने शर्माते हुए कहा, “मैं बस झाड़ू-पोछा कर देती हूँ, बाकी सब काम तो मम्मी करती हैं।”

बाबूलाल की भौहें सिकुड़ गईं, कसमसाकर रह गए। दुखी होकर बोले, “महाशय, ये शूद्र है, इसकी जाति शूद्र लिख दीजिए।”

जनगणना अधिकारी आश्चर्य से भर उठा और आवेश में चिल्लाया, “ये क्या तमाशा है? तुम ब्राह्मण हो, लड़की की माँ वैश्य है, और लड़की शूद्र?”

बाबूलाल उत्तर देना चाहते थे, कलुआ ने हाथ से रुकने का इशारा किया और भागा-भागा घर के बाहर गया। गिलास भर थूक, जो इतनी देर से रोका था, ज़मीन पर उड़ेला और भागा-भागा वापस आया।

कलुआ के चेहरे पर कोप की रेखाएँ थीं, वह बोला – “वाह चाचा, पिंकी शूद्र क्यों हुई भला, वो भी ब्राह्मण है।”

बाबूलाल ने तीखे स्वर में पूछा, “ब्राह्मण कैसे?”

कलुआ ने तर्क दिया, “आप भी तो ब्राह्मण हुए हैं न, तो वो भी ब्राह्मण है, मैं भी ब्राह्मण हूँ। या तो पिंकी भी ब्राह्मण मानी जाएगी, या सब शूद्र माने जाएँगे।”

बाबूलाल ने झल्लाकर डाँटा, “अरे मूर्ख, मैं तो कर्मों से ब्राह्मण बना हूँ। पिंकी अभी शूद्र ही मानी जाएगी, और तू कैसे ब्राह्मण हो गया? गुटखेबाज़ी, लप्पेबाज़ी, सोना, खाना, आवारागर्दी करना, इसके अलावा तू करता क्या है?”

कलुआ के आत्मसम्मान को भारी ठेस पहुँची। उसने अपनी टी-शर्ट उतार फेंकी, जनेऊ हाथ में लेकर गर्व से बोला, “ये देखो, ब्राह्मण हूँ मैं। आपकी तरह मैं भी आर्यसमाजी हूँ। वेद पढ़ना शुरू कर रहा हूँ। कोई एक दिन में ब्राह्मण नहीं बन जाता, धीरे-धीरे बनता जाता है। आर्यसमाज किसी को शूद्र या नीचा नहीं मानता। आपको कुछ पता नहीं है, जाने कैसे उम्र आर्यसमाज में निकाल दी आपने।”

बाबूलाल चीखे, “अरे दुष्ट, अब तू मुझे समाजी सिद्धांत सिखाएगा? चार दिन तुझे जनेऊ पहने नहीं हुए, ब्राह्मण नहीं, तू चांडाल है, चांडाल!”

कलुआ थोड़ा पीछे हटते हुए, किंतु आवेश दिखाते हुए चिल्लाया, “तो आप कौन-सा ब्राह्मण हैं? आप भी तो बने हैं, आपकी जाति तो…”

कलुआ अपनी बात पूरी न कर पाया था। बाबूलाल ने चप्पल उतारकर उसमें दो-तीन जमा दीं और कोने में रखी लाठी उठाने को भागे। कलुआ ने वहाँ ठहरना उचित न समझा और दौड़ लगा दी।

जनगणना कर्मचारी भी यह सब देखकर क्रोधित हो उठा और डाँटा, “देखिए बाबूलाल जी, ये क्या आपने कर्म-कर्म की बकवास लगा रखी है? एक ही व्यक्ति के कर्म दिन में, महीने में बदल जाते हैं, नौकरियाँ बदल जाती हैं, क्या उसकी जाति भी बदलती रहेगी? जाति न हुई, लंगोट हो गया, जब मन चाहा, दूसरा उतारकर पहन लो। आप रोज या हर महीने जाति बदलेंगे तो क्या हम आपकी चौखट पर ही डेरा डाले खड़े रहेंगे कि जाने कब इनकी जाति बदल जाये। अपनी सही जाति बताइए।”

बाबूलाल थोड़े नरम होकर समझाने लगे, “देखिए, जाति तो कर्म से ही होती है। भगवान अगर जन्म से जाति चाहते, तो सब अपनी जाति के हिसाब से कर्म न कर रहे होते?”

युवक भड़ककर बोला-  “अरे, भगवान अगर कर्म से ही जाति चाहते, तो उन्हें क्या, आपके संस्कार, प्रकृति, स्वभाव, गुण न पता होते? उसी के हिसाब से किसी ब्राह्मण के घर में ही न जन्म दे देते आपको? और आपकी इस सब बकवास के लिए मेरे पास समय नहीं है। अपनी सही जाति बताइए, जिसमें आपने जन्म लिया है। अन्यथा सही जानकारी न देने पर आपके खिलाफ कानूनी कार्यवाही होगी। गलत जानकारी देने पर सजा का प्रावधान है।”

बाबूलाल अब लज्जित और भयभीत हो उठे। सुशीला देवी हाथ जोड़कर बाबूलाल के सामने खड़ी होकर विनती करने लगीं, “बाबू जी, इन्हें माफ कीजिए। आर्यसमाज ने इनकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है। हमारी जाति धोबी है। शूद्र में आते हैं हम।”

युवक का कोप शांत हुआ।, “ इन्हे ऐसी बीमारियों से इन्हें दूर रखिए।” कहते हुए युवक घर से बाहर निकल गया।

बाबूलाल ठगे-से खड़े थे, जैसे वर्षों से अर्जित संपत्ति को कोई लूटकर ले गया। उन्होंने मन ही मन मोदी जी को गालियाँ दीं। कमरे से झाँक रही पिंकी अब भी मुस्कुरा रही थी। कलुआ का उसके लिए लड़ना उसे रोमांचित कर गया था।

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