सम्राट रथवीति ने देखा – गोमती नदी की पावन धारा स्वर्णिम बालुका पर कुसुमित नीप वृक्षों की छाया में मन्द-मन्द प्रवाहित हो रही है, मानो कोई ललिताङ्गी वधू सुवर्ण सूत्रों से बुनी हुई शाटिका धारण कर मनोहर नृत्य कर रही हो। पुण्यतट के समीप जल में कमलिनियाँ खिली हुई हैं, जैसे नदीदेवी के अधरों पर खिला हुआ हास्य हो। तट पर सारस युगल मौनभाव से खड़े हैं।
यहाँ से एक पगडंडी, समीप ही स्थित महर्षि अत्रि के तेजस्वी पुत्र ऋषि अर्चनाना के आश्रम की ओर जाती थी। सम्राट उसी पर चल पड़े। मार्ग के वृक्षों की छाया उन पर मंद-मंद झूल रही थी।
आश्रम में प्रवेश करते ही एक दिव्य शांति ने उन्हें आवृत्त कर लिया। यज्ञशाला से वेदमंत्रों की ऋचाएँ गूँज रही थीं। ऋषि अर्चनाना अपने शिष्यों के साथ यज्ञकुंड के समीप विराजमान थे। कुंड से उठती हुई ज्वालाएँ ऋग्वेदीय मंत्रों के साथ नृत्य कर रही थीं, मानो देवताओं के हाथों में थिरकती हुई स्वर्णाभ दीपशिखाएँ हों। ऋषिकुमारों के तपोनिष्ठ मुखमंडलों पर अग्निकिरणों का प्रतिबिंब पड़ रहा था, वे दिव्य तेज से दीप्तिमान प्रतिमाओं के समान प्रतीत हो रहे थे। सुगंधित घृत की सुगंध, समिधाओं की धूम और वनस्पतियों का मिश्रण वायु में विलीन होकर एक अलौकिक सुवास फैला रहा था।
सम्राट ने श्रद्धापूर्वक नेत्र मूँद लिए और समीप ही बैठ गए।
यज्ञ समाप्त होने पर, ऋषि अर्चनाना की दृष्टि महाराज पर पड़ी। वे धीरे से उठे और उनके समीप आकर बोले -“राजन्!”
सम्राट ने नेत्र खोले। ऋषि को अपने समक्ष देखकर तत्काल हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विनयपूर्वक बोले – “भगवन्! मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि मेरे पुण्यकर्म मुझे इस पावन भूमि पर ले आए। आपके दर्शन मात्र से मेरा जीवन धन्य हो गया।”
ऋषि ने कृपालु दृष्टि से देखते हुए आशीर्वाद दिया – “राजन्, आप स्वयं राजर्षि हैं। आपके आगमन से यह आश्रम और भी पवित्र हो गया है।कहिए, कैसे आपका आगमन हुआ?”
“मेरी पुत्री मनोरमा विवाह योग्य हो गई है ऋषिवर। आप तो उसकी विलक्षण प्रतिभा से परिचित ही हैं। उसके लिए वर खोजने से पूर्व मेरे मन में यह इच्छा जागृत हुई है कि आप अपने शिष्यों सहित मेरे राजभवन को पावन करें। वेदमंत्रों की यही पुनीत ध्वनि वहाँ भी गूँजे। यह यज्ञ आप ही सम्पन्न करें।”
ऋषि ने प्रसन्न होकर कहा – “राजन्, यह तो अत्यंत शुभ संकल्प है। आप तिथि निश्चित कर लें, मैं अपने ऋषिकुमारों सहित अवश्य उपस्थित होऊँगा।”
सम्राट ने हर्षित होकर ऋषि के चरणों में शिर नवाया – “आपकी असीम कृपा है, ऋषिवर!”
ऋषि ने उन्हें आशीर्वाद दिया। राजा प्रणाम करके विदा हुए।
आम्रवृक्ष के नीचे खड़े हुए ऋषिपुत्र श्यावाश्व ने सम्राट को जाते हुए देखा। वे अपने मित्र अश्विनी से बोले – “देखो, सम्राट रथवीति में कितनी विनम्रता है!”
“हाँ, पर क्या तुमने उनकी पुत्री राजकुमारी मनोरमा के विषय में सुना है?”
श्यावाश्व ने उत्सुक होकर पूछा – “नहीं, उनके विषय में क्या विशेष है?”
अश्विनी ने कहा – “मेरी माता गत मास महल से लौटी थीं। उन्होंने बताया कि राजकुमारी मनोरमा की सुंदरता अद्वितीय है। उनके अनुसार, ऐसी कन्या उन्होंने कभी नहीं देखी थी। वह न केवल रूपवती है, बल्कि गुणवती और विदुषी भी है।”
श्यावाश्व ने मुस्कुराते हुए कहा – “ऐसे राजर्षि की पुत्री का ऐसा होना स्वाभाविक ही है। परंतु क्या वह वास्तव में इतनी मनोहर है?”
अश्विनी ने कटाक्ष भरी दृष्टि से देखा – “क्यों, मित्र? तुम्हारे हृदय में कौन-सा भाव उमड़ रहा है? यदि इतनी ही जिज्ञासा है, तो शीघ्र ही तो उनके दर्शन हो ही जाएँगे।”
श्यावाश्व ने मित्र की बात को टालते हुए अन्यत्र ध्यान लगाया, किंतु उनके हृदय में एक अज्ञात आकांक्षा ने जन्म ले लिया।
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चन्द्रकिरण-सिक्त ऋषिकुल के कुटीर में श्यावाश्व की देह शय्या पर व्याकुल हो रही हैं। महर्षि अत्रि के वंशज, जिन्होंने यौवन के प्रथम स्पंदन से ही इन्द्रियदमन का कठोर व्रत पालन किया था, आज उसी देह में एक अग्नि-सी धधक रही थी। अश्विनी कुमार के वे शब्द अब भी श्रुतिपटल पर अंकित होकर गूँज रहे थे – “मित्र! राजकुमारी मनोरमा की विदुषता पर तो सरस्वती स्वयं न्योछावर हो जाएँ। उनके रूप पर रति भी लज्जित हो।”
श्यावाश्व ने करवट बदली। शरीर में एक अज्ञात वेदना उमड़ रही थी। वे मन ही मन विलाप करने लगे – “हे प्रभो! क्या यही मेरे तप का परिणाम है? जिस ब्रह्मचर्य को मैंने शिला-सा दृढ़ माना था, वह आज संयम धूल में मिलता जाता है।”
तभी उनके कंठ से अनायास ही गान फूट पड़ा – “मित्र, राजकुमारी से अधिक विदुषी अन्य कोई नहीं, उससे अधिक सुंदर कोई नहीं…”
कक्ष के कोने में अचानक एक छाया नाच उठी। यह कौन सुंदरी है? केशपाश में जड़ित मुक्ताफल झिलमिला रहे हैं। वे खड़े हुए, आँखें मूँदकर बोले – “मनोरमे, क्या तुम ही सचमुच यहाँ हो, या यह मेरा भ्रम है?”
आँखें बंद की, पुनः खोली – वहाँ कोई न था। केवल चंद्रिका की रजतिमा फर्श पर बिखरी थी।वे पुनः शय्या पर गिर पड़े। हाथों से मुख ढँक लिया। मन में उमड़ते प्रश्नों ने घेर लिया:
“कल यज्ञ में वे कैसी होंगी? क्या उनके नेत्र मेरी ओर उठेंगे? क्या मेरे प्रति उनके अधरों पर कोई मुस्कान खिलेगी? हे विधाता! क्या तू मुझे उनसे एक क्षण का संवाद भी देगा?”
बाहर वटवृक्ष पर कोयल का मधुर स्वर फूटा। श्यावाश्व ने सुना तो उनके अधरों पर एक विवश मुस्कान फैल गई – “तू भी क्या मेरी ही भाँति किसी की प्रतीक्षा में जाग रही है, हे सखी? क्या तेरा भी हृदय किसी के लिए तड़प रहा है?”
पूर्व दिशा में अरुणिमा के प्रथम चिह्न दिखाई देने लगे। श्यावाश्व ने एक लंबी श्वास ली। आज प्रभात का आगमन उन्हें इतना विलंबित क्यों प्रतीत हो रहा था? मानो समय ने स्वयं उनकी वेदना से करुणा खो दी हो और चिरनिद्रा में पड़ा हो।
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राजा रथवीति के भव्य महल के विस्तृत प्रांगण में शास्त्रीय सज्जा से यज्ञ-मंडप का निर्माण किया गया। महर्षि अर्चनाना ऋत्विज हैं और साथ बैठे हैं उनके पुत्र श्यावाश्व और अन्य वेदज्ञ शिष्य। श्यावाश्व की दृष्टि किसी को खोज रही है।
यज्ञशाला के स्वर्णजटित द्वार से ज्यों ही राजकुमारी मनोरमा ने प्रवेश किया, त्यों ही समस्त वातावरण मंत्रमुग्ध-सा हो गया। उनके मुखचन्द्र की कांति पूर्णिमा के चन्द्रमा को भी लज्जित करती प्रतीत होती थी। अधरों पर सजी रक्तिमा ऐसी मनोहारिणी थी, मानो स्वयं कामदेव ने रक्तोत्पल के रस से उन्हें रंग दिया हो। नासिका की सुडौल रेखा तिलपुष्प-सी कोमल थी, जिसके समीप विराजमान नेत्रयुगल विशाल कमलदल-सदृश थे – नीलोत्पल की श्यामलता से युक्त, जिन्हें देखकर मनुष्य स्वयं को विस्मृत कर दे। भौंहों का सुडौल वक्र धनुष-सा सजीव प्रतीत होता था, जिस पर सज्जित बाणों के समान नयनों के कटाक्ष विराजमान थे।
यज्ञ प्रारंभ हुआ। मंत्रोच्चारण की लय के साथ घृताहुतियों की सुवर्णिम धाराएँ अग्निवेदी के मुख में समाने लगीं। समिधाओं से उठती ज्वालाओं से नीले, पीले, रक्तिम रंगों की लपटें उठने लगीं।
किंतु ऋषिकुमार श्यावाश्व की दृष्टि राजकुमारी मनोरमा पर केंद्रित थी। हवनधेनु के दुग्ध से अभिषिक्त मनोरमा का मुखमंडल कमल की भाँति खिल रहा था। अग्निकिरणों ने उनके गालो पर जो रक्तिम आभा बिखेरी थी, वह श्यावाश्व के हृदय में विद्युत-सी प्रवाहित कर रही थी।
यज्ञकर्म में तल्लीन उस नतमुखी कन्या के पीछे लहराते केशपाश नीलाम्बुदमाला-से प्रतीत होते थे। उनमें गुंथे मुक्ताहार पवन के स्पर्श पर मंद-मंद झंकृत होते, मानो दूरस्थ किसी निर्झर की मधुर स्वरलहरी हो। कर्णपालियों में सजे माणिक्य के दीपक उनके गुलाबी गालों पर स्वर्णिम आभा बिखेर रहे थे।
ग्रीवा की मृदु रेखा मंदारमाला से अलंकृत थी, जिसका प्रत्येक पुष्प उनके तन की सुगंध से मिलकर नवीन सुवास उत्पन्न कर रहा था। स्कंधों पर विश्रांत अलकावलि मानसरोवर के तट पर लहराती लताओं-सी शोभायमान थी। हस्तयुगल में विभूषित कंकणों की मधुर झंकार यज्ञमंत्रों के साथ तालमेल बिठाती प्रतीत होती थी।
ऋषिकुमार श्यावाश्व का हृदय उस दृश्य को देखकर पुलकित हो उठा। उनके मन में उठे भावों को वाणी देते हुए वे स्वयं से प्रश्न करने लगे – “क्या यह मानवी है या अप्सरा? क्या धरती पर ऐसा सौंदर्य संभव है? इसके नेत्रों में वह गहराई क्यों है, जो मेरे अंतरतम को झकझोर देती है?”
उनके मुख सेउच्चारण जारी था – ‘यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरस्तात्’। किंतु हृदय तो उस दिव्य रूप के सम्मुख नत हो चुका था। कंठ से निकलते वेदपाठ के स्वर और हृदय में उमड़ते प्रेमभाव के बीच एक विचित्र विरोधाभास उत्पन्न हो गया था।
श्यावाश्व ने देखा कि मनोरमा ने सिर उठाकर उन्हें देखा। उस एक क्षण के दृष्टि-मिलन में श्यावाश्व को लगा, मानो समस्त सृष्टि स्तब्ध हो गई हो। उनके कंठ से मंत्रोच्चारण रुक गया।
राजकुमारी की दृष्टि में जिज्ञासा और लज्जा का अनूठा मिश्रण था। वे तत्क्षण नेत्र झुका बैठीं, किंतु उनके हृदय में भी एक अज्ञात हलचल हो उठी।
महर्षि अर्चनाना ने देखा कि श्यावाश्व की दृष्टि राजकुमारी पर है। वह कभी मौन हो जाता है, तो कभी उच्च स्वर में मंत्र बोलने लगता है। उन्होंने अपने पुत्र के मन की दशा को भाँप लिया।
यज्ञ समाप्त हुआ। राजकुमारी ने प्रस्थान करते हुए एक बार पुनः श्यावाश्व की ओर देखा। उनके नेत्रों में एक प्रश्न था, एक आकांक्षा थी, एक अनकही कथा थी। श्यावाश्व ने भी उस दृष्टि का उत्तर दृष्टि से दे दिया।
राजा रथवीति की दृष्टि ऋषिकुमार पर पड़ी, जो महल की ओर जाती राजकुमारी को देख रहे थे। उनसे भी ऋषिकुमार का मनोभाव छिपा न रहा।
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महाराज रथवीति महारानी के प्रासाद में पधारे। उनके नेत्रों में अपूर्व तेज था, मुखमंडल पर यज्ञसमापन की दिव्य प्रसन्नता विराजमान थी। सहर्ष उन्होंने सहधर्मिणी से कहा- “प्रिये! आज देवताओं ने हमारे यज्ञ का तत्क्षण व साक्षात् फल प्रदान किया है। राजकुमारी मनोरमा के लिए योग्यतम वर प्राप्त हुआ”
“योग्य वर? किंतु महाराज, आप तो यज्ञकर्म में निमग्न थे। वर-चयन का अवसर कब आया?” – महारानी ने विस्मयविभोर नेत्रों से पति की ओर देखा
“देवप्रसाद तो अकस्मात् ही प्राप्त होता है, प्रिये! क्या तुमने उस ऋषिकुमार को नहीं देखा-जिसके तपस्तेज से यज्ञशाला आलोकित हो उठी थी?”
“वह युवक… श्यावाश्व?” महारानी के ओष्ठों से नाम शंकास्पद स्वर में निकला।
“हाँ! महर्षि अत्रि के वंशधर, वेदवेदांगपारंगत उस तपस्वी से श्रेष्ठ वर और कौन होगा? और सौभाग्य देखो, ऋषिकुमार की सम्मति से स्वयं महर्षि ने विवाह-प्रस्ताव रखा है!”
महारानी के मुखचन्द्रमा पर आनंद के स्थान पर चिंता की रेखाएँ उभर आईं। वे मंद स्वर में बोलीं- “महाराज, वह कन्या के योग्य नहीं।”
राजा चकित हुएँ – “क्या कहती हो? वह अयोग्य कैसे?”
“वह मंत्र-द्रष्टा नहीं है, स्वामिन्। ऋषि-पदवी का सार तो मंत्रसाक्षात्कार में है।
राजा ने समाधान देने का प्रयत्न किया- “प्रिये, वह अभी यौवन के प्रथम चरण में है। समय आने पर अवश्य ही मंत्र-द्रष्टा होंगे। क्या तुम उनके कुल-गौरव को नहीं जानतीं? अत्रिवंश में जन्मा कोई अयोग्य कैसे हो सकता है?”
“महाराज, मंत्र-द्रष्टा होना वयस का विषय नहीं, अपितु दिव्य दृष्टि का प्रश्न है। आप स्वयं राजर्षि हैं-क्या नहीं जानते कि ऋषित्व तो जन्मजात प्राप्त होता है? मैं अपनी पुत्री का पाणिग्रहण केवल उसी वर से करूँगी, जिसने वेदमंत्रों का साक्षात् दर्शन किया हो।” – महारानी अविचलित रहीं।
महाराज रथवीति निराश हुये, निरुत्तर हुएँ। । वे यज्ञशाला की ओर लौट चले, उत्तर की प्रतीक्षा करते महर्षि और ऋषिकुमार के पास। उनका मस्तिष्क दोहरा रहा था – ‘ऐसे तेजस्वी ऋषिकुमार में भला क्या अयोग्यता हो सकती है?’ कानों में रानी के स्वर गूँज रहे थे – ‘वह मंत्र-द्रष्टा नहीं है।
शचीन्द्र शर्मा


