मंत्रदृष्टा ‘अपाला – (वैदिक कथा)
वन्यप्रदेश में, वट वृक्ष की सघन पर्णछाया सूर्यदेव की किरणों को मृदु करके धरती पर…
बाबूलाल आर्य, गाँव के सबसे कट्टर आर्यसमाजी थे। 55 वर्ष की आयु थी, दुबले पतले थे, नाटा कद था। चेहरे के अधिकांश भाग पर बड़ी मूछों का कब्जा था, लेकिन खोपड़ी ऐसी सपाट जैसे वहाँ कभी कोई बाल जैसी वस्तु न रही हो। फिर चेहरे की बनावट ऐसी थी कि दुखी भी हों तो मुस्कुराते…
घर के आँगन में आरामकुर्सी पर बैठे, बाबूलाल आर्य ने तंबाकू मलते हुए उपदेश देना शुरू किया, “देखो बेटा कलुआ, ऋषि दयानंद ने इस जात-पात की बेड़ी को न तोड़ा होता, तो हम आज भी सवर्णों के बाड़े में गोबर उठा रहे होते, उनके चाकर बने होते। महर्षि ने हमें सिर उठाना सिखाया, आँख से…
स्वामी दयानन्द एवं उनके अन्धानुयायी, धर्मशास्त्रों के अनुगामी नहीं होना चाहते। उनके अनुसार वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, स्मृतियाँ, दर्शन आदि सभी प्राचीन ग्रन्थों को स्वामी दयानन्द और सत्यार्थ प्रकाश का अनुगामी होना चाहिए। ऐसा मानते हुए, शास्त्रों में जो भी कथन उनके आर्यसमाजी मत के विरुद्ध होता है, वे उसे तत्क्षण ‘प्रक्षिप्त’ घोषित कर देते हैं। “यह…
जब किसी आर्यसमाजी को अपनी संकीर्ण बुद्धि से प्राचीन शास्त्रों का कोई विषय समझ न आए, तो वह झट से कह देता है कि – “अरे यह तो अवैदिक है, प्रक्षेप है, गप्प है, असंभव है।” आर्यसमाजियों के एक अवैदिक पाखंडी वर्ग ने तो इसे अपना स्वभाव बना लिया हैं। डॉक्टर मधुलिका आर्या जी ने…
आर्यसमाजी ओम् को प्रत्येक स्थान पर ‘ओ३म्’ लिखते है। जो कि पूर्णतः अनार्ष व्यवहार है, एवं व्याकरणसम्मत भी नहीं है। ओम् शब्द अ+उ+म् , इन तीन वर्णो से बना है। इसमें महर्षि पाणिनि के “आद्गुणः” इस सूत्र के नियमानुसार अ + उ मिल कर “ओ” हो जाता है, जैसे “पर + उपकार” में र में…
सम्राट रथवीति ने देखा – गोमती नदी की पावन धारा स्वर्णिम बालुका पर कुसुमित नीप वृक्षों की छाया में मन्द-मन्द प्रवाहित हो रही है, मानो कोई ललिताङ्गी वधू सुवर्ण सूत्रों से बुनी हुई शाटिका धारण कर मनोहर नृत्य कर रही हो। पुण्यतट के समीप जल में कमलिनियाँ खिली हुई हैं, जैसे नदीदेवी के अधरों पर…
स्निग्ध प्रकृति के वक्षस्थल पर, चन्द्रिका की श्वेत, शीतल, क्षीरधारा सी अमृत अंजलि चारु विस्तार पा रही हैं। आकाशगंगा की दुग्धधारा में तारारूपी पुष्प तैर रहे हैं। आश्रम के शांत कुटीर के अग्रभाग में दीपक का कंपित प्रकाश झिलमिला रहा है। वह प्रभा , उपस्थित नवदंपति के हृदयों में उत्पन्न , परस्पर आकर्षण व प्रथम…
चित्रपाल आर्य (आर्यसमाजी) ने कहा – मूर्तिपूजा सनातन धर्म का सबसे बड़ा पाखंड है। महर्षि दयानन्द जी ने कहा कि मूर्तिपूजा पाप है, अधर्म है, और वेद के विरुद्ध है। अतः इसका निश्चय होना चाहिए। मैंने (सनातन वैदिक धर्मी) ने पूछा – यह बताइए, मूर्तिपूजा से आप क्या समझते हैं? चित्रपाल बोले – मूर्ति जड़ पदार्थों…
सनातन धर्म एवं शास्त्र :- संक्षिप्त निरूपण हिन्दू धर्म का प्राचीन नाम ‘सनातन धर्म’ है। जो धर्म हिन्दू जाति में अनादि काल से प्रवृत्त है, आगे भी अनंत काल तक रहेगा, वह सनातन धर्म है। इस धरती पर समय समय पर अनेक धर्माभास उत्पन्न होते है किन्तु ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ (उत्पन्न हुये का नाश…
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