कहानी
आर्यसमाज का अ वैदिक विवाह – (हास्य कथा)
बाबूलाल आर्य, गाँव के सबसे कट्टर आर्यसमाजी थे। 55 वर्ष की आयु थी, दुबले पतले थे, नाटा कद था। चेहरे के अधिकांश भाग पर बड़ी मूछों का कब्जा था, लेकिन खोपड़ी ऐसी सपाट जैसे वहाँ कभी कोई बाल जैसी वस्तु न रही हो। फिर चेहरे की बनावट ऐसी थी कि दुखी भी हों तो मुस्कुराते…
आर्यसमाजी की ‘जाति-गत जनगणना’
घर के आँगन में आरामकुर्सी पर बैठे, बाबूलाल आर्य ने तंबाकू मलते हुए उपदेश देना शुरू किया, “देखो बेटा कलुआ, ऋषि दयानंद ने इस जात-पात की बेड़ी को न तोड़ा होता, तो हम आज भी सवर्णों के बाड़े में गोबर उठा रहे होते, उनके चाकर बने होते। महर्षि ने हमें सिर उठाना सिखाया, आँख से…
मंत्रदृष्टा ‘घोषा’ (वैदिक-कथा)
स्निग्ध प्रकृति के वक्षस्थल पर, चन्द्रिका की श्वेत, शीतल, क्षीरधारा सी अमृत अंजलि चारु विस्तार पा रही हैं। आकाशगंगा की दुग्धधारा में तारारूपी पुष्प तैर रहे हैं। आश्रम के शांत कुटीर के अग्रभाग में दीपक का कंपित प्रकाश झिलमिला रहा है। वह प्रभा , उपस्थित नवदंपति के हृदयों में उत्पन्न , परस्पर आकर्षण व प्रथम…
मंत्रदृष्टा ‘अपाला – (वैदिक कथा)
वन्यप्रदेश में, वट वृक्ष की सघन पर्णछाया सूर्यदेव की किरणों को मृदु करके धरती पर स्वर्णमयी आभा बिखेर रही थी। वहीं एक पाँच वर्षीय ऋषि कन्या पद्मासन में बैठी थी। कोमल मुख कमल-सा निर्मल था। बड़ी-बड़ी आँखें थीं, किन्तु बंद थीं, मानो दो नन्हें तारे रात्रि में विश्राम कर रहे हों। काले लंबे केश लटों…


