दारुकवन प्रसंग

एक थे पंडित मनसाराम। आर्यसमाजी थे। आर्यसमाज इन्हें एक महान विभूति और बहुत बड़ा विद्वान मानता है, इन्हें “वैदिक तोप” कहता है। अपनी एक पुस्तक में इन्होंने जो लिखा है, उसे पढ़िए – “महादेवजी जो सर्वथा नग्न होकर और लिंग को हाथ में पकड़कर दारुवन में ऋषियों की स्त्रियों में धावा जा बोले और जिस…

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सर्वत्र ‘ओ३म्’ लिखना अशुद्ध हैं?

आर्यसमाजी ओम् को प्रत्येक स्थान पर ‘ओ३म्’ लिखते है। जो कि पूर्णतः अनार्ष व्यवहार है, एवं व्याकरणसम्मत भी नहीं है। ओम् शब्द अ+उ+म् , इन तीन वर्णो से बना है। इसमें महर्षि पाणिनि के “आद्गुणः” इस सूत्र के नियमानुसार अ + उ मिल कर “ओ” हो जाता है, जैसे “पर + उपकार” में र में…

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महर्षि अगस्त्य का समुद्रपान

जब किसी आर्यसमाजी को अपनी संकीर्ण बुद्धि से प्राचीन शास्त्रों का कोई विषय समझ न आए, तो वह झट से कह देता है कि – “अरे यह तो अवैदिक है, प्रक्षेप है, गप्प है, असंभव है।”  आर्यसमाजियों के एक अवैदिक पाखंडी वर्ग ने तो इसे अपना स्वभाव बना लिया हैं। डॉक्टर मधुलिका आर्या जी ने…

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मूर्ति पूजा उपपत्ति

चित्रपाल आर्य (आर्यसमाजी) ने कहा – मूर्तिपूजा सनातन धर्म का सबसे बड़ा पाखंड है। महर्षि दयानन्द जी ने कहा कि मूर्तिपूजा पाप है, अधर्म है, और वेद के विरुद्ध है। अतः इसका निश्चय होना चाहिए। मैंने (सनातन वैदिक धर्मी) ने पूछा – यह बताइए, मूर्तिपूजा से आप क्या समझते हैं? चित्रपाल बोले – मूर्ति जड़ पदार्थों…

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सनातन धर्म एवं शास्त्र :- संक्षिप्त निरूपण

सनातन धर्म एवं शास्त्र :- संक्षिप्त निरूपण हिन्दू धर्म का प्राचीन नाम ‘सनातन धर्म’ है। जो धर्म हिन्दू जाति में अनादि काल से प्रवृत्त है, आगे भी अनंत काल तक रहेगा, वह सनातन धर्म है। इस धरती पर समय समय पर अनेक धर्माभास उत्पन्न होते है किन्तु ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ (उत्पन्न हुये का नाश…

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हिन्दू धर्म में , देवताओ की संख्या ? ३३ या ३३ करोड़?

 बृहदारण्यक उपनिषद में शाकल्य और याज्ञवल्क्य के मध्य, देवताओ की संख्या को लेकर संक्षिप्त संवाद होता है –   शाकल्य पुछते है – कति देवा याज्ञवल्क्य? (याज्ञवल्क्य, कितने देवता है ? ) याज्ञवल्क्य उत्तर देते है – त्रयस्त्रिंशद् । (तैतीस देवता है) शाकल्य – कतमे ते त्रयस्त्रिंशद् इति?( वे तैतीस कौन कौन से है ?) याज्ञवल्क्य- …

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महाभारत का वास्तविक स्वरूप

स्वामी दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश में लिखते है कि – ” राजा भोज के राज्य में व्यास जी के नाम से मार्कन्डेय और शिवपुराण किसी ने बनाकर खड़ा किया था। उसका समाचार राजा भोज को होने से उन पंडितो को हस्तच्छेदनादि दंड दिया और उनसे कहा कि – “जो कोई ग्रंथ बनावे तो अपने नाम से बनावे,…

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