वेदानर्थक दयानंद

दयानन्द (सत्यार्थ प्रकाश ) में लिखते है — इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु। दशास्यां पुत्रान् आधेहि पतिमेकादशं कृधि॥ दयानन्द का अर्थ – हे (मीढ्वः इन्द्र) वीर्य सेचन में समर्थ ऐश्वर्ययुक्त पुरुष! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्ययुक्त कर। इस विवाहित स्त्री में दश पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवें…

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वेदभ्रान्तार्थकर्ता दयानन्द

किसी स्त्री का पति मृत्यु को प्राप्त हो जाए, और वह दुखियारी स्त्री पति की मृत देह के समीप बैठकर बिलख-बिलख कर रो रही हो, और कोई व्यक्ति आकर उस स्त्री से कहे कि – “हे विधवा, तू इस मरे हुए पति की आशा छोड़ , तू यहाँ जो जीवित पुरुष खड़े हैं, उनमें से…

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दारुकवन प्रसंग

एक थे पंडित मनसाराम। आर्यसमाजी थे। आर्यसमाज इन्हें एक महान विभूति और बहुत बड़ा विद्वान मानता है, इन्हें “वैदिक तोप” कहता है। अपनी एक पुस्तक में इन्होंने जो लिखा है, उसे पढ़िए – “महादेवजी जो सर्वथा नग्न होकर और लिंग को हाथ में पकड़कर दारुवन में ऋषियों की स्त्रियों में धावा जा बोले और जिस…

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सर्वत्र ‘ओ३म्’ लिखना अशुद्ध हैं?

आर्यसमाजी ओम् को प्रत्येक स्थान पर ‘ओ३म्’ लिखते है। जो कि पूर्णतः अनार्ष व्यवहार है, एवं व्याकरणसम्मत भी नहीं है। ओम् शब्द अ+उ+म् , इन तीन वर्णो से बना है। इसमें महर्षि पाणिनि के “आद्गुणः” इस सूत्र के नियमानुसार अ + उ मिल कर “ओ” हो जाता है, जैसे “पर + उपकार” में र में…

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आर्यसमाज का अ वैदिक विवाह – (हास्य कथा)

बाबूलाल आर्य, गाँव के सबसे कट्टर आर्यसमाजी थे। 55 वर्ष की आयु थी, दुबले पतले थे, नाटा कद था। चेहरे के अधिकांश भाग पर बड़ी मूछों का कब्जा था, लेकिन खोपड़ी ऐसी सपाट जैसे वहाँ कभी कोई बाल जैसी वस्तु न रही हो। फिर चेहरे की बनावट ऐसी थी कि दुखी भी हों तो मुस्कुराते…

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आर्यसमाजी की ‘जाति-गत जनगणना’

घर के आँगन में आरामकुर्सी पर बैठे, बाबूलाल आर्य ने तंबाकू मलते हुए उपदेश देना शुरू किया, “देखो बेटा कलुआ, ऋषि दयानंद ने इस जात-पात की बेड़ी को न तोड़ा होता, तो हम आज भी सवर्णों के बाड़े में गोबर उठा रहे होते, उनके चाकर बने होते। महर्षि ने हमें सिर उठाना सिखाया, आँख से…

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मनुस्मृति के हत्यारे – आर्यसमाजी

स्वामी दयानन्द एवं उनके अन्धानुयायी, धर्मशास्त्रों के अनुगामी नहीं होना चाहते। उनके अनुसार वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, स्मृतियाँ, दर्शन आदि सभी प्राचीन ग्रन्थों को स्वामी दयानन्द और सत्यार्थ प्रकाश का अनुगामी होना चाहिए। ऐसा मानते हुए, शास्त्रों में जो भी कथन उनके आर्यसमाजी मत के विरुद्ध होता है, वे उसे तत्क्षण ‘प्रक्षिप्त’ घोषित कर देते हैं। “यह…

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महर्षि अगस्त्य का समुद्रपान

जब किसी आर्यसमाजी को अपनी संकीर्ण बुद्धि से प्राचीन शास्त्रों का कोई विषय समझ न आए, तो वह झट से कह देता है कि – “अरे यह तो अवैदिक है, प्रक्षेप है, गप्प है, असंभव है।”  आर्यसमाजियों के एक अवैदिक पाखंडी वर्ग ने तो इसे अपना स्वभाव बना लिया हैं। डॉक्टर मधुलिका आर्या जी ने…

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महाभारत का वास्तविक स्वरूप

स्वामी दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश में लिखते है कि – ” राजा भोज के राज्य में व्यास जी के नाम से मार्कन्डेय और शिवपुराण किसी ने बनाकर खड़ा किया था। उसका समाचार राजा भोज को होने से उन पंडितो को हस्तच्छेदनादि दंड दिया और उनसे कहा कि – “जो कोई ग्रंथ बनावे तो अपने नाम से बनावे,…

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