सनातन धर्म एवं शास्त्र :- संक्षिप्त निरूपण
हिन्दू धर्म का प्राचीन नाम ‘सनातन धर्म’ है। जो धर्म हिन्दू जाति में अनादि काल से प्रवृत्त है, आगे भी अनंत काल तक रहेगा, वह सनातन धर्म है। इस धरती पर समय समय पर अनेक धर्माभास उत्पन्न होते है किन्तु ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ (उत्पन्न हुये का नाश निश्चित है) के आधार पर यह सब पंथ, मत आदि विनष्ट हो जाया करते है। किन्तु सनातन धर्म किसी विशेष तिथि में नहीं जन्मा, न ही कोई पुरुष इसका जन्मदाता है, यह भगवान की शक्ति होने से,अपौरुषेय होने से, सनातन है। हमारे हिन्दू धर्म की यह संज्ञा सृष्टि के आदिकाल से ही है। अन्य सब एकदेशी नाम है , जैसे कि – ‘वैदिक धर्म’, ‘श्रौतधर्म, स्मार्तधर्म, पौराणिकधर्म आदि । यह सब सनातन धर्म के अंग है एवं इन सबकी समुच्चित संज्ञा ‘सनातन धर्म’ है।
सनातन, परमात्मा का धर्म होने से , परमात्मा का नाम होने से, इसका नाम ‘सनातन धर्म’ ग्रहण होता है। जैसा कि अथर्ववेद संहिता में कहा है – “सनातनमेनमाहरुताद्य स्यात्पुनर्णवः (१०।८।२३) अर्थात उस देव को सनातन अर्थात पुराण-पुरुष, नित्य-पुरुष कहते है, किन्तु वह आज भी नवीन है। गीता में कहा गया है – “त्वमव्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे (११।१८ ) तुम (श्री कृष्ण) सनातन पुरुष हो, अनादि धर्म के रक्षक हो । मनुस्मृति मे आता है – ” सूक्ष्मोSव्यक्त: सनातन: (१।७)। सनातन – सना भव: सनातन: ‘ , जो सदा रहने वाला है उसे सनातन कहते है। और ऐसे केवल परमात्मा ही है । अतः सनातन परमात्मा का नाम होने से ,गुण होने से , उनका यह धर्म, सनातन धर्म सम्पन्न होता है । जैसे परमात्मा का कभी जन्म नहीं कहा जा सकता, ऐसे ही इस धर्म का भी किसी विशेष समय जन्म हुआ ऐसा नहीं कहा जा सकता। सनातन धर्म का मूल सनातनपुरुष है , महाभारत में भी कहा गया है – ‘सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतत्सनातनम्’ ।
सनातन धर्म उस वैद्य की भांति नहीं है, जिसके पास केवल एक ही औषधि है, यह उस वैद्य की तरह है जिसके पास सभी तरह के रोगियो के हेतु सभी तरह की औषधिया है। ईसाई ,इस्लाम, बौद्ध, एवं आर्यसमाज आदि मजहबो पंथो की तरह इसमें केवल एक ही प्रकार की उपासना पद्यति नहीं है, बल्कि यहाँ अधिकारियों की विविधता से यथाधिकार व्यवस्था है। इसमें किसी का अधिकार छीनकर दूसरों को देने की परंपरा नहीं है, यहाँ प्रत्येक पुरुष अपनी अपनी जाति में अपने कर्तव्यो को पूर्ण करता हुआ, भगवान की आज्ञा को पूर्ण करता है।
जब कि वर्तमान समय में जितने भी अर्वाचीन पंथ है , उनके लक्षण है – 1- उनके कर्ता (प्रवर्तक) विशेषता से स्मृत किए जाते है। जैसे कि ईसाई , ईशा मसीह को , मुसलमान मोहम्मद को, बौद्ध बुद्ध को , आर्यसमाजी दयानन्द को दिन रात भजते रहते है। इनमें से कोई 100 वर्ष पुराना है कोई हजार । इनमें से कोई भी 5000 वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं। किन्तु सनातन धर्म की तो संवत्सर संख्या ही अनन्त है। २ – इसमें सीमित १०,२० नियम नहीं है, अन्य पंथो की भांति। इसमें देश-पात्र भेद से असंख्यों नियम है। ३ – किन्तु इस धर्म में कोई हठ नहीं है कि , तुम्हें धर्म के सभी विकल्पो को अपनाने हेतु बाध्य होना पड़ेगा। कहा गया है – ‘स्वस्य च प्रियमात्मन:’ अर्थात वेदादि शास्त्रो में धर्म के जो अनेकों विकल्प है, उनमें से आत्मा को प्रिय लगने वाले का ही अनुसरण करके, उस एक पर ही दृढ़ रहकर भी कल्याण को प्राप्त किया जा सकता है। जैसे कि , मूर्ख व्यक्ति जो निरक्षर हो वह वेद न पढ सके, यज्ञ न कर सके तो कोई समस्या नहीं है , वह एकनिष्ठ होकर केवल परमात्मा का अत्यंत सरल नाम ‘राम’ का भी सतत जाप करेगा तो उसी कल्याण का भागी होगा। यदि कोई गूंगा भी हो और श्री राम को केन्द्रित करके किसी भी नाम से , उस ईश्वर का चिंतन कर ले वह भी अपना कल्याण कर सकता है। अतः विश्वमात्र में सत्य-धर्म और सर्वोपयोगी धर्म ‘सनातन धर्म’ ही है । इसमें मनुष्यमात्र अपनी जाति के अस्तित्व को रखता हुआ , देशाचार एवं कुलाचार के साथ साथ अपने अस्तित्व को स्थापित कर सकता है। ब्राह्मण से लेकर चांडाल तक , इस धर्म में अपना निर्वाह कर सकते है।
अन्य मत-मतांतरों में जहां सभी प्रकार के पुरुषो के लिए एक ही प्रकार की साधना सारिणी बना दी जाती है, चाहे कोई मूर्ख हो या विद्वान, सात्विक प्रवृत्ति का हो या तामसिक प्रवृत्ति का , चाहे धनी हो या दरिद्र , ब्राह्मण हो या शूद्र । जब कि सनातन धर्म में ऐसी अपूर्णता नहीं है । इस अपौरुषेय सनातन धर्म में , अधिकारीभेद से अनेकों साधनभेद है। विविध श्रेणियों के, विभिन्न प्रवर्तियों के, भिन्न भिन्न प्रकृति के, गुणो के व्यक्ति अपनी योग्यता, अधिकार, बुद्धि एवं आत्मा को प्रिय हो , इसके अनुरूप साधन को अपना सकते है। यह धर्म भिन्न भिन्न अधिकारियों को एक समान मार्ग में चलने को बाध्य नहीं करता , बल्कि उनके अनुरूप ही साधन बताता है। सनातन धर्म की इस विशिष्टता को विधर्मी दुर्भावना से प्रस्तुत करते हुये कहते है कि सनातन धर्म मनुष्य मनुष्य में भेद करता है, किन्तु यह भेद नहीं है बल्कि विशेषता है। और इन विधर्मियों को यथायोग्य प्रत्युत्तर देने में सर्वथा असमर्थ अनेक मूर्ख हिन्दू भी , हिन्दू-एकता के नाम पर सनातन धर्म के ही सिद्धांतो का का विरोध करते हुये, प्रत्यक्ष रूप से ईश्वरद्रोह करने में तत्पर हो उठते है। जब कि उन्हे समझना चाहिये कि, यह ईश्वरीय धर्म होने से इसके स्वरूप और मूल सिद्धांतो में कोई परिवर्तन नहीं होता न ही परिवर्तन करने की आवश्यकता है। विशेषताओ से, वर्तमान समय की विवशताओ के नाम पर लज्जित होकर धर्मशास्त्र के सिद्धांतो के विपरीत उपदेश से, यहाँ इस लोक में तो अपनी भंगुर चमक बनाई जा सकती है किन्तु पारलौकिक दृष्टि से इसमें अहित ही निहित है।
जिन्हे इसमें कमिया लगे वह वास्तव में उनकी बुद्धि का ही दोष है। इसका एक प्रमाण यह भी है कि , सनातन धर्म का पूर्ण-विद्वान होने पर व्यक्ति कभी किसी दूसरे धर्म में नहीं जाता, न ही इतिहास में आज तक गया है । किन्तु अन्य पंथो मतो के बड़े बड़े विद्वान भी उधर से इधर आते देखे जाते है। अतः इसमें सब प्रकार से अतिशयता सिद्ध होती है।
इस सनातन धर्म के सर्वोच्च, स्वतः प्रमाण शास्त्र है ‘वेद’। धर्म का मूलस्त्रोत वही है। वेद दो भागो में विभक्त है – 1- मंत्र, 2- ब्राह्मण । फिर वेदज्ञान को नियमरूप से व्यवस्थित करने वाली स्मृतिया है । स्मृतियो में धर्मसूत्र, गृह्वासूत्र, धर्मशास्त्र आदि अन्तर्भूत हो जाते है।
अतः वेद श्रव्य-काव्य है , स्मृतिया उनकी व्यवस्थापक है। इसके बाद फिर पुराण-इतिहास में वेद और स्मृतियो के उदाहरण-प्रत्युदाहरण देकर उनको स्पष्ट किया जाता है ।
जैसे कि वेद का उपदेश है – सत्यं वद’ । सत्य बोलो ……. । यह श्रव्यकाव्य है, यह सुना जाता है। सामान्य लोग इसे केवल सुनकर अपने आचरण में लाने हेतु विशेष आकर्षित नहीं होते। अतः उनके लिए यह वेद वाक्य ‘सत्यं वद’ केवल काव्य में पड़ा ही रहेगा। तब इस उपदेश को, अदृष्ट काव्य को , दृश्य काव्य में परिवर्तित किया जाता है। जैसे कि इसे राजा हरिश्चंद्र के उपाख्यान रूप में पुराण प्रस्तुत करते है, तब साधारण लोगो पर इसका भारी प्रभाव पड़ता है, और अनेक लोग इन उपाख्यानों से प्रेरित होकर पुराण-इतिहास के माध्यम से वेद के ही सिद्धान्त का अनुसरण करने के लिए तत्पर हो उठते हैं। मुगलो के क्रूरकाल में, अंग्रेज़ो के कूटनीतिक मोहकाल में और आज के उपेक्षाकाल में , असंख्यों सामान्य जन जो सनातन धर्म पर सुस्थिर है , इसका विशेष श्रेय पुराण-इतिहास को ही जाता है।
(१ ) वेद – वेद के दो भाग है – पहला मंत्रभाग, दूसरा ब्राह्मणभाग । मंत्रभाग में संहिताए होती है , जैसे कि ऋग्वेद की 21 संहिताए होती है, जिनमें से केवल दो संहिताए ही आज मिलती है, शेष लुप्त है। इसी प्रकार यजुर्वेद आदि की कुल मिलाकर 1131 संहिताए है, ये वेद का मंत्रभाग है। एवं जितने मंत्रभाग है , उनका ब्राह्मणभाग भी उतना ही है। ब्राह्मणभाग संहिता का विनियोग एवं अर्थरूप होता है। शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य होता है। अतः संहिता, ब्राह्मण , उपनिषदे आदि सभी को मिलाकर ‘वेद’ संज्ञा होती है। आजकल आर्यसमाजियों ने जो वेद के केवल मंत्रभाग को, और उसमें भी प्रमुखता से एक शाखा को लेकर, चार पुस्तकों को वेद कहने का जो दुष्प्रचार किया है , वह उनकी नवीन मान्यता है, अपने पंथ के सिद्धांतो को उन चार पुस्तकों से मनमाने अर्थ करके निकालने हेतु। चार पुस्तके वेद नहीं है , बल्कि ऋग, यजु आदि चार प्रकार के वेद है। जिसमें कि उन उन प्रकार के वेदो के अर्थरूप विस्ताररूप ब्राह्मण ग्रंथ, उपनिषदे आदि सम्मलित है।
(२) उपवेद – जैसे वेद चार प्रकार के है, वैसे ही उपवेद भी। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद, अर्थवेद आदि। आयुर्वेद में शारीरिक व्याधियों को दूर करना, दैवोपचार, औषधोपचार आदि वर्णित है। आयुर्वेद में भी विभिन्न संहिताए होती है, जैसे कि आयुर्वेद की , सुश्रुत, चरक, भेल, काश्यप आदि है। धनुर्वेद में युद्धविद्या का विषय, तथा अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का वर्णन है, इसके आविष्कारक विश्वामित्र आदि ऋषि है। गांधर्ववेद में अनेक तरह के स्वर, गान आदि का वर्णन है। अर्थवेद या स्थापत्य वेद में अनेक प्रकार के यान विमान, भूगर्भ आदि विद्या, वास्तुविद्या आदि का वर्णन है।
(३) वेदांग – वेद के छह अंग होते है – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष, इन्हे वेदांग कहा जाता है। शिक्षा के अंतर्गत , व्यासशिक्षा, याज्ञवल्क्य शिक्षा, गौतमी आदि शिक्षाए है, जिनमें वर्णोच्चारण आदि सिखाया गया है। पाणिनी, याज्ञवल्क्य आदि इनके आविष्कारक है। कल्प में वेद की भिन्न-भिन्न संहिताओ के मंत्रो का विनियोग, यज्ञविधियो एवं अनुष्ठान का वर्णन है। इनमें नक्षत्रकल्प,वेदकल्प, संहिताकल्प, आंगीरसकल्प, शांतिकल्प आदि ग्रंथ है तथा इनके अतिरिक्त आश्वलायन, शांखायन, पारस्कर, आपस्तम्ब, मानव, हिरण्यकेशी, बोधायन, जैमिनी, वैखानस, गोभिल, कौशिक, भारद्वाज आदि गृह्वसूत्र तथा बोधायन, आपस्तम्ब,आश्वलायन आदि श्रौतसूत्र अन्तर्भूत है। यह भिन्न भिन्न संहिता के वेदमंत्रो का विनियोग तथा कर्तव्यता का उपदेश करते है। व्याकरण में वैदिक और लौकिक शब्दो की सिद्धि और स्वर-परिचय बताए जाते है। इनमें पाणिनीय व्याकरण प्रसिद्ध है।ऐन्द्र, शाकल्य, आदि व्याकरण अस्त है । अष्टाध्यायी, धातुपाठ, लिंगानुशासन, पंचपादी, दशपादी लौकिक और वैदिक व्याकरण के परिचायक है। निरुक्त जिसमें कि वैदिक शब्दो का संग्रहकोश रूप, निघंटू के निर्वाचन तथा निगम और भाष्य निरूपित है तथा छंद जिसमें कि वैदिक और लौकिक छंदो का वर्णन है। ये सब व्याकरण के अंतर्गत आते है । छठे अंग ज्योतिष में गणित और फलित यह दो विषय होता है। यज्ञों के काल आदि के प्रतिपादन के अर्थ इसका उपयोग होता है। गणित से ग्रहो का राशि आदि में घूमना , राशि-परिवर्तन का समय तथा फलित के द्वारा ग्रहो का हमारे शरीर और जीवन पर प्रभाव को जाना जाता है। सूर्य आदि इस शास्त्र के प्रणेता है। ज्योतिष के सूर्य सिद्धान्त, सिद्धान्त-शिरोमणि आदि गणित के तथा भृगु संहिता ग्रंथ फलित के प्रसिद्ध है।
(४ ) वेद के उपांग – वेद के चार उपांग है – पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र। इनमें पुराण शब्द से – पुराण, उपपुराण, औपपुराण, तंत्रशास्त्र एवं रामायण-महाभारत आदि इतिहास गृहीत होते है। न्याय शब्द से , न्याय-वैशेषिक, सांख्य, योग आदि दर्शन गृहीत होते है। मीमांसा से – पूर्व-मीमांसा और उत्तरमीमांसा से न्याय आदि छह दर्शन गृहीत होते है। धर्मशास्त्र से – धर्मसूत्र तथा स्मृतिया गृहीत होती है।
इनमें वेद का जो प्रथम उपांग है – पुराण । जिनमें ऋषि मुनियो द्वारा वेद के कठिन विषय – गाथा, इतिहास आदि के माध्यम से सरल कर दिये गए है, उन्हे पुराण कहते है , इनके प्रवक्ता भगवान वेदव्यास है। इसके अंतर्गत १८ पुराण आते है – ब्रह्मा, पद्म, विष्णु, शिव या वायु, लिंग, गरुड़, नारद,भागवत, अग्नि, स्कन्द, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, मार्कण्डेय, वामन, वाराह, मत्स्य,कूर्म और ब्रह्मांड। पुराणो में वेद , गागर में सागर की तरह समाये है, इनमें वेद के सम्पूर्ण तत्व अत्यंत सरल रूप में कहे गए है। इस तरह इन पुराणो के भी उपपुराण और औपपुराण भी 18 होते है। और तंत्रशास्त्रो का भी समावेश पुराणो के अंतर्गत ही हो जाता है। इसमें दूसरा भाग इतिहास होता है, जिससे मुख्यतः रामायण और महाभारत लिए जाते है। रामायण आदिकवि श्री वाल्मीकि जी की रचना है, जिसमें कि भगवान श्रीरामावतार का विवरण है, जिसमें 24 हजार पद्य माने जाते है। दूसरा महाभारत एक लाख पद्यो का है, इसमें सनातन धर्म के सभी विषय इतिहास द्वारा व्याख्यात कर दिये गए है।
न्याय- मीमांसा के अंतर्गत ६ दर्शन आ जाते है। जिनमें सांख्यदर्शन श्री कपिल मुनि प्रणीत है, इसमें प्रकृति-पुरुष का वर्णन है, इस पर विज्ञानभिक्षु का भाष्य है। दूसरा योगदर्शन , इसके कर्ता श्री पतंजलिमुनि है, इस पर व्यासभाष्य है। इसमें योग की ग्रंथियाँ सुलझाई गयी है। तीसरा वैशेषिकदर्शन – इसके प्रणेता श्री कणाद मुनि है, इस पर प्रशस्तपाद का भाष्य है, इसमें संसार को छह भागो में विभक्त करके उसका विवरण किया गया है। चौथा है न्याय , इसमें 16 पदार्थो का तत्वज्ञान विषय है, श्री गौतममुनि इसके प्रणेता है, श्रीवात्सायनमुनि का इस पर भाष्य है। पांचवा मीमांसा , जिसके श्री जैमिनी जी कर्ता है, वैदिककर्मकांड की मीमांसा इसका विषय है, इस पर श्री शबराचार्य का भाष्य है। छठा है , वेदान्तदर्शन – इसके कर्ता श्री वेदव्यासजी है, इसमें जीव और ब्रह्म की अद्वैतता पर विचार किया गया है। इस पर श्रीशंकराचार्य, श्रीरामानुजाचार्य, श्री मध्वाचार्य, श्री वल्लभाचार्य आदि के भाष्य मिलते है।
वेद का अंतिम उपांग है – धर्मशास्त्र – इसमें धर्मसूत्र तथा स्मृतिया अन्तर्भूत होती है। धर्म के सूत्रण(संक्षेप) का नाम धर्मसूत्र है और वेदार्थ के स्मरण का नाम स्मृति है। धर्मसूत्रों में,- गौतम, वसिष्ठ, आपस्तम्ब, बोधायन आदि धर्मसूत्र मिलते है। मनुस्मृति, अत्रिस्मृति, आपसतम्बस्मृति, औशनस, कात्यायन,गोभिल, यम,याज्ञवल्क्य, नारद, गौतम आदि 60 स्मृतिया मिलती है। स्मृतियो में आचार,संस्कार, वर्णधर्म, वर्णसंकरधर्म, स्त्रीधर्म, पुरुषधर्म, राजधर्म, प्रायश्चित्तादि बहुत विषय आते है।
वेद, स्मृति पुराणो में विरोध होने की स्थिति में वेद अधिक माननीय है। स्मृति और पुराण के विरोध में स्मृति अधिक माननीय है। क्यो कि पुराण प्रधानता से लोकवृत्त का प्रतिपादन करते है, लोकव्यवहार की व्यवस्थापना उनका प्रधान विषय नहीं है, यह धर्मशास्त्र का मुख्य विषय है। इस प्रकार यह विपुल साहित्य सब मिलकर सनातन धर्म का आधार बनता है।


