वेदभ्रान्तार्थकर्ता दयानन्द

किसी स्त्री का पति मृत्यु को प्राप्त हो जाए, और वह दुखियारी स्त्री पति की मृत देह के समीप बैठकर बिलख-बिलख कर रो रही हो, और कोई व्यक्ति आकर उस स्त्री से कहे कि – “हे विधवा, तू इस मरे हुए पति की आशा छोड़ , तू यहाँ जो जीवित पुरुष खड़े हैं, उनमें से किसी एक को पति बनाकर नियोग (संभोग) करके बच्चा पैदा कर ले।”

शोकाकुल स्त्री को पति की लाश के सामने ही, उसे अन्य किसी से संभोग कराने का कथित वैदिक आदेश देने वाले ये महान व्यक्ति दयानन्द थे। हालाँकि वेद में ऐसा नहीं लिखा है, किन्तु नियोग करवाने हेतु सदैव आतुर रहने वाले दयानन्द, वेद में प्रक्षेप करके अर्थात मनगढ़ंत अर्थ करके अपने चेलों को ऐसा आदेश दे गए हैं।

दयानन्द ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में ‘उदीर्ष्व नारि’ मंत्र का जो अर्थ किया है, वह वैदिक व्याकरण, श्रौत-सूत्र, न्याय और शोक संवेदना – सभी दृष्टियों से असंगत एवं आपत्तिजनक है।

मंत्र है – उदी॑र्ष्व नार्य॒भि जी॑वलो॒कं ग॒तासु॑मे॒तमुप॑ शेष॒ एहि॑ । ह॒स्त॒ग्रा॒भस्य॑ दिधि॒षोस्तवे॒दं पत्यु॑र्जनि॒त्वम॒भि सं ब॑भूथ ॥

दयानन्द का अर्थ – (नारि) विधवे, तू (एतं गतासुम्) इस मरे हुए पति की आशा छोड़ के, (शेषे) बाकी पुरुषों में से (अभि जीवलोकम्) जीते हुए दूसरे पति को (उपैहि) प्राप्त हो, और (उदीर्ष्व) इस बात का विचार और निश्चय रख कि जो (हस्तग्राभस्य दिधिषो:) तुम विधवा के पुनः पाणिग्रहण करने वाले नियुक्त पति के सम्बन्ध के लिए नियोग होगा, तो (इदम्) यह (जनित्वम्) जना हुआ बालक उसी नियुक्त (पत्यु:) पति का होगा, और जो तू अपने लिए नियोग करेगी, तो यह संतान (तव) तेरा होगा। ऐसे निश्चय युक्त (अभि सम्बभूथ) हो, और नियुक्त पुरुष भी इसी नियम का पालन करे। (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास ४)

अब देखिये, दयानन्द ने अपने कल्पित दयानन्दी-नियोग की सिद्धि के लिए वेद मंत्र में क्या-क्या प्रक्षेप किया है –

“आशा छोड़ के”, “बाकी पुरुषों में से”, “जीते हुए दूसरे पति को”, “इस बात का विचार और निश्चय रख”, “तुझ विधवा के पुनः पाणिग्रहण करने वाले नियुक्त”, “पति के सम्बन्ध के लिए नियोग होगा”, “जना हुआ बालक नियुक्त पति का होगा”, “और जो तू अपने लिए नियोग करेगी तो वह संतान”, “तेरा होगा ऐसे निश्चययुक्त” – ये सब शब्द मंत्र में नहीं हैं, दयानन्द ने अपनी ओर से बढ़ाकर प्रक्षेप कर दिए हैं।

“गतासुम्” शब्द के अर्थ में “आशा छोड़ के” – यह किस पद का अर्थ है?

“शेषे” यह क्रिया है। इसी का मंत्र में सर्वानुदात्त स्वर है। ‘उप’ उसी का उपसर्ग है, लेकिन स्वामी दयानन्द ने “शेषे” को सुबन्त बनाकर “उप” का “एहि” से योग करके, संस्कृत से अशिक्षित अपने पशुबुद्धि चेलों की आँखों में धूल डालने का कार्य किया है।

यहाँ “उप शेषे” तिङन्त क्रियापद है। “उप शेषे एहि” में “उप” के सामने ठहरे हुए “शेषे” इस तिङ् को “तिङ्ङतिङः” इस पाणिनीय सूत्र से निघात हुआ है, वैसा ही ऋग्वेद तथा अथर्व के उक्त मंत्र के पदपाठ में प्रत्यक्ष है – “उप” . शेषे . आ ।

फिर संहिता में “स्वरितात् संहितायामनुदात्तानाम्” इस पाणिनीय सूत्र से स्वरित के आगे पड़े हुए सभी अनुदात्तों को प्रचय हो गया। उदात्त की भाँति प्रचय का चिन्ह भी नहीं होता है। इस प्रकार “शे” को प्रचय हो गया। तब “षे” इस अनुदात्त को भी प्रचय प्राप्त था, पर उसके सामने “आ” यह उदात्त है। तब “उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतरः” (पाणिनीय सूत्र) इस सूत्र से अनुदात्त के चिन्ह वाला अनुदात्ततर हो गया। तब “शेषे” यह स्वर-शास्त्रानुसार तिङ् क्रिया सिद्ध होने से, उसे सुप् बनाकर “इस मरे हुए की आशा छोड़ के, बाकी पुरुषों में से जीते हुए दूसरे पति को प्राप्त हो” – यह “बाकी” का अर्थ करना स्वामी दयानन्द का मनगढ़ंत अशुद्ध प्रयत्न होने से खण्डित हो गया।

सरल शब्दों में समझिए –

शब्द है – (अभि जीवलोकम्) – दयानन्द ने अर्थ किया – “जीते हुए दूसरे पति को”।

‘अभि’ यहाँ उपसर्ग है, द्वितीया का प्रत्यय है। ‘जीवलोकम्’ कर्मकारक में है। इसका अर्थ होता है – जीवितों का लोक।

जब ‘अभि’ किसी गत्यर्थक धातु के साथ युक्त हो, तो वहाँ ‘अभि + द्वितीया’ का प्रयोग गम्यार्थ के लिए होता है।

अतः इसका अर्थ होता है – “जीवित लोक की ओर आ”, अर्थात जीवित लोक की ओर लौट आ। मंत्र में कहा जा रहा है कि – तू अपने पति के साथ मत मर, यहाँ जो सब जीते हैं, इस जीवित लोक की ओर आ। वेदों में अन्यत्र भी ‘जीवलोक’ का प्रयोग मृत्युलोक के विपरीत – इस जीवित मनुष्यों के संसार के लिए हुआ है।

‘जीवलोक’ का अर्थ भला ‘जीवित पति’ कैसे हो सकता है? यह ऐसी मूर्खता है जैसे कोई ‘पृथ्वीलोक’ का अर्थ ‘जीवित बेटा’ लिख दे। दयानन्द अपने मनगढ़ंत सिद्धान्त के लिए देखिये कैसा अनर्थ करके अपने अशिक्षित चेलों को मूर्ख बना गए हैं। और ये अनपढ़ मूर्ख ऐसी अविद्वता पर लहालोट होते जाते हैं कि – हाय, हमारे दयानन्द रिशी जैसा महाविद्वान कभी धरती पर न हुआ। और जो इन्हें सत्य बताए, उसे गाली देते हैं।

दयानन्द के इस अशुद्ध अर्थ को दयानन्द-पंथी आज भी नियोग के प्रमाणस्वरूप देते फिरते हैं। लेकिन आर्यसमाज के कई बड़े विद्वानों में तुलसीराम आदिमें थोड़ी शर्म बाकी थी, इसलिए उन्होंने भी दयानन्द के इस अनर्थ को नहीं माना।

मृतक पति के पास जब स्त्री अनुमरण के लिए लेटी हो, तब उसे उठाने के लिए यह मंत्र है। इस मंत्र में कहा गया है कि – “हे नारी, जाया रूप तुममें, तुम्हारा पति पुत्र रूप में तुमसे उत्पन्न हो चुका। वह पुत्र तुम्हारा ही है, इसलिए अब तुम्हें मरने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि तुम्हारे पति का अंश तो तुम्हारे घर में विद्यमान ही है। तू इसी का संरक्षण कर।”

इस मंत्र का यह सही अर्थ आचार्य सायण ने किया है।

व्यवहार में भी यही किया जाता है – जब किसी स्त्री का पति मर जाता है, तो वह स्त्री शोकाकुल होती है, मृतक के प्रति उसकी निष्ठा एवं प्रेम होता है। परिवार के लोग उसे यही सांत्वना देते हैं कि – “देख, तुम्हारे पति का अंश यह पुत्र है, इसकी देखभाल कर।” क्या कोई व्यक्ति उस रोती हुई स्त्री को मृत पति की चिता के पास से खींचकर मोहल्ले के पुरुषों में से कोई ‘दूसरा पति’ चुनने को कहेगा?

ऐसी कल्पना भी कितनी अमानवीय, क्रूर व अशोभनीय है।

किन्तु धन्य हैं स्वामी नियोगानन्द और उनके अनपढ़ अंधे चेले, जो पति का शव सामने पड़ा हो, पत्नी बिलख-बिलख कर मर जाना चाहती हो, अपने प्रियतम की मृत्यु पर छाती पीट रही हो, उस दुखियारी स्त्री को, वहाँ आए हुए पुरुषों में से किसी को “प्रियतम” बनाने का आदेश दे रहे हैं।

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