दयानन्द (सत्यार्थ प्रकाश ) में लिखते है — इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु। दशास्यां पुत्रान् आधेहि पतिमेकादशं कृधि॥
दयानन्द का अर्थ – हे (मीढ्वः इन्द्र) वीर्य सेचन में समर्थ ऐश्वर्ययुक्त पुरुष! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्ययुक्त कर। इस विवाहित स्त्री में दश पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को मान! हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दश संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ। इस वेद की आज्ञा से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यवर्णीय स्त्री और पुरुष दश-दश संतान से अधिक उत्पन्न न करें। जैसा (इमां त्वमिन्द्र) इस मन्त्र में ग्यारहवें पुरुष तक स्त्री नियोग कर सकती है, वैसे पुरुष भी ग्यारहवीं स्त्री तक नियोग कर सकता है।
शचीन्द्र – यह मंत्र ऋग्वेद के दशम मंडल के पचासीवें सूक्त का पैंतालीसवाँ मंत्र है, जो ‘विवाह सूक्त’ नाम से अभिहित है। इस सूक्त के पूर्ववर्ती मंत्र “आ नः प्रजां जनयतु प्रजापतिः” और उत्तरवर्ती मंत्र “अघोरचक्षुरपतिघ्नी” आदि में स्पष्ट रूप से वर ही वक्ता है और देवता संबोध्य हैं। अतः इस मंत्र का वक्ता भी वर ही है, न कि कोई स्त्री या नियुक्त पुरुष।
अब व्याकरण की दृष्टि से देखें तो मंत्र में “इन्द्र” एवं “मीढ्वः”यह – मिह् सेचने धातु से क्वसुप्रत्यय, पाणिनि सूत्र “दाश्वान्-साह्वान्-मीढ्वाश्च” से सिद्ध हैं। ये दोनों संबोधन पद हैं, जिनका अर्थ है “हे वर्षक, कामनाओं की वृष्टि करने वाले इन्द्र!”। “त्वम्” युष्मद् का प्रथमा एकवचन है, जो इन्द्र के लिए है। मंत्र में ‘स्त्री’ के लिए कोई संबोधन पद नहीं है। यदि स्त्री संबोध्य होती तो उसके लिए “त्वम्” (युष्मद् की प्रथमा) का प्रयोग होता, परंतु यहाँ “इमाम्” (इदम् शब्द की द्वितीया) का प्रयोग है, जो कर्म कारक है, संबोधन नहीं। अतः दयानन्द ने जो “हे स्त्री” अर्थ निकाला हैं, वह अपनी इच्छा से लिख दिया हैं।
अब प्रश्न है ‘नियोग’ का। स्वामी दयानन्द ने “दशास्यां पुत्रान् आ धेहि” का अर्थ “नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर” किया है, किंतु इस मंत्र में ‘नियुक्त पुरुष’ शब्द भी मंत्र में नहीं हैं। ‘आधेहि’ क्रिया का कर्ता ‘त्वम्’ (इन्द्र) है, न कि स्त्री या कोई अन्य पुरुष। ‘धा’ धातु का अर्थ ‘स्थापन करना’ है, अर्थात इन्द्र देवता से प्रार्थना है कि वह इस स्त्री में दस पुत्रों की स्थापना करें। यहाँ ‘दश’ पुत्रों की संख्या है, पतियों की नहीं।
दूसरी क्रिया ‘कृधि’ – कृ धातु, लोट् मध्यम पुरुष एकवचन का कर्ता भी ‘त्वम्’ -इन्द्र ही है। यह एक कामना है कि वह स्त्री दस पुत्रों की माता बने और ग्यारहवा वो पति हो। यहाँ ‘एकादशम्’ (द्वितीया, एकवचन) का ‘डट्’ प्रत्यय ‘ग्यारहवाँ’ का वाचक है, न कि ‘ग्यारह पतियों’ का। व्याकरण के अनुसार, “एकादशानां पूरण एकादशः” डट् प्रत्यय से ग्यारहवें का अर्थ होता है। यदि ग्यारह पतियों का अर्थ होता तो ‘एकादश पतीन्’ इस बहुवचन का प्रयोग होता। इस प्रकार स्वामी दयानन्द का अर्थ व्याकरण विरुद्ध है, क्योंकि उन्होंने ‘एकादशम्’ का ‘ग्यारहवें तक’ अर्थ करके डट् प्रत्यय का सामर्थ्य ही नष्ट कर दिया है।
‘पति’ शब्द का अर्थ यहाँ विवाहित पति ही है, नियोगी पुरुष नहीं, क्योंकि नियोगी पुरुष न तो पालन करता है, न रक्षा, न ही वैवाहिक दायित्व निभाता है। विवाह सूक्त में ‘पति’ का प्रयोग सदैव विवाहित पति के अर्थ में ही हुआ है। यह भी ध्यातव्य है कि ‘सुभगाम्’ का अर्थ केवल सुहागन स्त्री के लिए ही संभव है, दयानंदी-नियोग में तो पुरुष न स्त्री की रक्षा करता हैं , न भरण-पोषण करता है, न वह सौभाग्य का दाता हैं, वह तो हाथ हिलाते हुये आता है और वीर्य सेचन करके, हाथ झाड़ते हुये अपने घर चला जाता हैं। अतः सब प्रकार से पति का अर्थ यहाँ विवाहित पति ही हैं, नियोगी नहीं।
‘इन्द्र’ का अर्थ ‘पति’ करना भी निराधार है, क्योंकि पूरे विवाह सूक्त में कहीं भी वर को ‘इन्द्र’ नहीं कहा गया है, बल्कि वर इन्द्र से प्रार्थना करता है। प्रकरण के परिप्रेक्ष्य में देखें तो इस सूक्त में वर से लेकर विश्वेदेवा तक सभी देवता संबोध्य हैं।
दूसरा – दयानन्द द्वारा “मीढ्वः इन्द्र” से वर को प्रतिपाद्य माना गया है, तो मंत्र के चतुर्थ पाद में स्त्री को संबोध्या कैसे माना गया? मंत्र में स्त्री के लिए कौन-सा संबोधनपद है? यदि “मीढ्वः” को स्त्री का संबोधन माना जाए, तो इसका अर्थ होगा “वीर्य सेचन करने वाली”। तब क्या आर्यसमाजी महिलाएँ भी , आर्यसमाजी पुरुषों में वीर्य सेचन कर दिया करती हैं? यह भी हास्यास्पद है।
मंत्र के पूर्वार्ध में, “इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु”, इन्द्र से स्त्री के लिए दो प्रार्थनाएँ की गई हैं: पहली, वह पुत्रवती हो; दूसरी, वह सुभगा (सौभाग्यशालिनी) हो। तीसरे पाद में, “दशास्यां पुत्रान् आधेहि”, पुत्रों की संख्या दस बताई गई है। चतुर्थ पाद में, “पतिमेकादशं कृधि”, सुभगात्व के संदर्भ में कहा गया है कि इस स्त्री के पति को स्थिर कर, अर्थात् पति के माध्यम से इसके सौभाग्य को स्थापित कर। यहाँ “कृ” धातु का अर्थ स्थापन भी है, जैसा कि “कुरु पदानि घनोरु, शनैः शनैः” में देखा जाता है, क्योंकि कृ धातु सामान्यवाची है।
मंत्र में वर, इन्द्र देवता से प्रार्थना करता है। इन्द्र वृष्टि के देवता है, इसलिए उन्हे “मीढ्वान्” कहा गया है। यह “भि सेचने” -भ्वादिगण, परस्मैपदी – से क्वसुप्रत्यय और निपात के साथ संबुद्धि में प्रयुक्त है, जो पाणिनि सूत्र “दाश्वान्-साह्वान्-मीढ्वाचश्र” और “मतुवसो रुसंबुद्धौ छंदसि” से सिद्ध है। वर कहता है, “हे मनोरथादि की वृष्टिकर्ता इन्द्र, इस स्त्री में दस पुत्रों का आधान-स्थापन कर, और ग्यारहवें मुझ पति को स्थापित कर।
अतः इस मंत्र में नियोग की दूर दूर तक गंध भी नहीं हैं। किन्तु दयानन्द ने व्याकरण, प्रकरण, कोष, की हत्या करते हुए मनमाना हास्यास्पद अर्थ कर दिया। ताकि उनके मूर्ख व अनपढ़ अनुयाई, अपनी मूर्खता से इसे वेदाज्ञा समझकर – ‘एक स्त्री का 11 पुरूषों से ‘ और ‘एक पुरुष का 11 स्त्रियो’ से भोग कराकर व्यभिचार कर सके।
जब कि मंत्र विवाह सूक्त का था जो कि सौभाग्य, संतान और वैवाहिक जीवन की समृद्धि के लिए प्रार्थना कर रहा था। धरती का कोई दयानंदी, दयानन्द के किए इस अनर्थ को सिद्ध नहीं कर सकता। अतः दयानंदियों को चाहिए कि सत्य को स्वीकार करे कि – स्वामी दयानन्द ने ये मनगढ़ंत व्याख्या की हैं।
ऐसा केवल हम ही नहीं कहते हैं। पूर्व के आर्यसमाज के भी कई ऐसे बड़े विद्वान रहे हैं, जिन्हौने दयानन्द के इस अर्थ को गलत माना हैं, और स्पष्ट घोषणा भी की हैं कि दयानंद ने ये अर्थ गलत किया हैं। तथा वेद में कही यह दयानंदी-नियोग नहीं हैं। तब क्या दयानंदी उन सबको भी गाली देंगे? अतः वेद में नियोग न होने पर भी वेदो में नियोग बताने से दयानन्द झूठे भी सिद्ध होते हैं।
वेद में इस प्रकार प्रक्षेप करने वाला, वेद के सत्य अर्थ की हत्या करते हुये, बलात् उससे अपनी बेतुकी मान्यता सिद्ध करने का प्रयास करने वाला व्यक्ति क्या ऋषि महर्षि कहलाने योग्य हैं?


